इंद्रधनुष के समान हैं श्रीकृष्ण! – ओशो

कृष्ण के सौंदर्य में बड़ी गहराई थी। जैसे नदी में जहां गहराई होती है, वहां जल सांवरा हो जाता है। यह सौंदर्य देह का ही सौंदर्य नहीं था, यह हमारा मतलब है। ख्याल मत लेना कि कृष्ण सांवले थे। रहे हों न रहे हों, यह बात बड़ी बात नहीं है लेकिन सांवरा हमारा प्रतीक है, इस बात का कि यह सौंदर्य शरीर का ही नहीं था, यह सौंदर्य आत्म का था। यहा सौंदर्य इतना गहरा था, उस गहराई के कारण चेहरे पर सांवरापन था, छिछला नहीं था सौंदर्य। अनंत गहराई लिए था। यह तुम्हारा मोर के पंख से बना हुआ मुकुट, यह तुम्हारा सुंदर मुकुट. जिसमें सारे रंग समाएं है। वही प्रतीक है। मोर के पंखों से बनाया गया मुकुट में सारे रंग समाए हैं। महावीर में एक रंग है, बुद्ध में एक रंग है, राम में एक रंग है- कृष्ण में सब रंग है। इसलिए कृष्ण को हमने पूर्णावतार कहा है। सब रंग हैं। इस जगत की कोई चीज कृष्ण को छोड़नी नहीं पड़ी है। सभी को आत्मसात कर लिया है। कृष्ण इंद्रधनुष है, जिसमें प्रकाश के सभी रंग हैं। कृष्ण त्यागी नहीं हैष कृष्ण भोगी नहीं हैं। कृष्ण ऐसे त्यागी हैं, जो भोगी हैं। कृष्ण ऐसे भोगी हैं, जो त्यागी है। कृष्ण हिमालय नहीं भाग गए हैं, बाजार में हैं। युद्ध के मैदान में हैं। वही एकांत। वही शांत अपूर्व सन्नटा। कृष्ण अदभुत अव्दैत हैं। चुना नहीं है कृष्ण ने कुछ। सभी रंगों को स्वीकार किया है, क्योंकि सभी रंग परमात्मा के हैं।




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