अनोखी है ब्रज की लठमार होली

डा. श्रीनाथ शास्त्री, मथुरा
होली यूं तो भारत के प्रत्येक प्रांत में हर्षोल्लास के साथ मनायी जाती है, परन्तु ब्रज की होली अपनी अनूठी परम्पराओं के कारण सारे संसार में प्रसिद्घ है। यहां होली का रंग बसंत पंचमी से लेकर चैत्र कृष्ण दशमी तक ब्रज के कण-कण में छाया रहता है। ब्रज में होली की शुरुआत बसंत पंचमी से हो जाती है। इस दिन ब्रज के सभी मंदिरों में ठाकुरजी के नित्य-प्रति के श्रृंगार में गुलाल का प्रयोग होने लगता है। भगवान श्री कृष्ण एवं श्री राधा रानी के प्रेम की प्रतीक होली बसंत पंचमी से दौज को होने वाले दाऊजी के हुरंगे के दिन ‘‘ढप धर दै यार गयी पर की’’ ढप धर दै, के गायन के साथ समाप्त होती है। इस तरह होली पैतालीस दिन तक ब्रज में मनायी जाती है। इस समय वृन्दावन के विश्व प्रसिद्घ श्री बाँके बिहारी मन्दिर राधाबल्लभ जी, श्री राधा रमण, राधा दामोदर, स्कोन मन्दिर, शाह बिहारी आदि मन्दिरों में अबीर गुलाल, बसन्ती रंग फूलों के साथ उडऩा और उड़ाना रंग में सरोवर ना विलाश गड़, भानु गड़
इन सभी स्थानों पर बरसाने की लट्ठ मार होली की तालीम (रिहरर्सल) पद् गायन एवं घमार प्रारम्भ हो चुकी है। बरसाने की प्रसिद्घ लट्ठमार होली रंग भरनी एकादशी २४ फरवरी को मनायी जाएगी। इस दिन नन्द गाँव के ग्वाला जिन्हे हुरियार भी कहा जाता है। वे सभी बरसाने में ही स्थित भानुश्वर पर भाँग पिस्ते काजू दूध मलायी रबड़ी इन चीजों से मिक्स ठंडाई छान घोंटकर विजया भवानी लगाकर गाते मृदंग, ढ़ोल, ढप, झाँझ, शंख, शहनायी, मजीरा और बंसी बजाते हुए होली का आनंद लेते हैं। ब्रज में होली की विधिवत शुरुआत फाल्गुन एकादशी को मथुरा मांट मार्ग पर मथुरा से अठारह किमी दूर स्थित मानसरोवर गांव में लगने वाले राधारानी के मेले से होती है। इसके बाद फाल्गुन शुक्ल नवमी को बरसाना में नंदगांव के हुरिहारों (पुरुषों) और बरसाना की गोपियों (स्त्रियों) के मध्य  विश्व प्रसिद्घ लठामार होली होती है। इस होली में नंदगांव के गुसांई अपने को श्रीकृष्ण का प्रतिनिधि मानकर और बरसाने के गुसांई अपने को राधारानी का प्रतिनिधि मानकर नंदगांव के गुसांइयों को रंग की बौछारों के मध्य प्रेम भरी गालियां देते हैं। साथ ही श्रृंगार रस से परिपूर्ण हंसी-मजाक करते हैं। इसके बाद बरसाने की गोपियां घूंघट की ओट से नंदगांव के हुरिहारों पर लाठियों की बौछार करतीं हैं। हुरिहारे इन प्रहारों को रसिया गा-गाकर अपनी ढालों पर रोकते हैं। नंदगांव की होली के बाद अगले दिन पूरे ब्रज में एकादशी का पर्व बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन ब्रज के प्राय:सभी मंदिरों में ठाकुरजी के समक्ष रंग गुलाल,इत्र,केवड़ा और गुलाब जल आदि की होली होती है। कुछ मंदिरों में राधाकृष्ण के स्वरूप की झांकिया भी निकलती हैं। फाल्गुन शुक्ल एकादशी से फाल्गुन पूर्णिमासी तक पूरे पांच दिन वृंदावन के बांकेबिहारी मंदिर में सुबह-शाम गुलाल,टेसू के रंग की होली खेली जाती है। ब्रज में वन-उपवनों एवं उद्यान वाटिकाओं की भरमार है। जिनमें शीतऋतु के बाद सुहानी बसंत ऋतु आने पर नाना प्रकार के फूल खिलते हैं। अत: ब्रज में होली पर रंगबिरंगे,कोमल-मृदुल,महकते मुस्काते पुष्पों से भी होली खेली जाती है। फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को होलिका दहन होता है। इस दिन मथुरा के फालैन और जटवारी गांव के जिस प्रकार होली जलाई जाती है वह अप्रतिम है। यहां फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को विशालकाय होली जलाई जाती है। इस होली को यहां के प्रहलाद मंदिर का पंडा प्रहलाद कुण्ड में स्नान करने के बाद प्रज्वलित करता है और होली की लम्बह-लम्बी लपटों को नंगे पांव पार करता है। परन्तु उसका बाल बांका भी नही होता। हेलिका दहन के अगले दिन यानि धुलैडी को ब्रज में रंग और गुलाल की होली खेली जाती है। इस दिन सारे देश में होली समाप्त हो जाती है, किंतु ब्रज में इसके दस दिन बाद तक भी किसी न किसी रूप में होली चलती रहती है। धुलैटी के दिन से चार दिन तक ब्रज में तानों के गायन का क्रम चलता रहता है। यह ब्रज की विशेष समूहगान शैली है। तानगायकी की ब्रज के अलाव कहीं और सुनने को नहीं मिलती। चैत्रकृष्ण द्वितिया को मथुरा से 22 किमी दूर बल्देव (दाऊजी)में ठाकुर दाऊदयाल मंदिर में दाऊजी का हुरंगा होता है,जो कि अत्यधिक लोकप्रिय है। इसे बड़ा फाग भी कहा जाता है। इस हुरंगे में गुसांई समाज के हुरिहारे व महिलाऐ गोप व गोपियों के स्वरूप में होली खेलते हैं। दाऊजी के मंदिर के प्रांगण में घुटनो-घुटनों भरे पानी एवं रंग गुलाल की इन्द्रधनुषी छटा में होने वाले इस अनूठे हुरंगे में होली खेलने आयी हुरिहारिनें,हुरिहारों के शरीर से उनके कपड़े फाड़ती हैं तत्पश्चात वह इन फटे कपड़ों के कोड़े बनाकर उनसे गीले बदन हुरिहारों की जमकर पिटाई करतीं हैं। इसके प्रति-उत्तर में ब्रज के ये वीर हुरिहारे मंदिर में बने हुए कुण्ड में से पिचकारियों व बाल्टियों में रंग भर-भरकर हुरिहारियों को रंग से सरावोर कर देते हैं। ब्रज में होली की मस्ती में धुलैटी से लेकर चैत्रकृष्ण दशमी तक जगह-जगह चरकुला नृत्य,हल नृत्य,हुक्कानृत्य,बंबनृत्य ,तख्तनृत्य,चोचर एवं झूला आदि जैसे मनोहारी नृत्य होते हैं। चैत्रकृष्ण ततीया से लेकर चैत्र कृष्ण दशमी तक सभी मंदिरों में फूलडोल की छटा छाई रहती है। इस दौरान मंदिरों के विग्रहों के विभिन्न प्रकार के फूलों द्वारा नयनाभिराम श्रृंगार किये जाते हैं। इस अवसर पर उत्कृष्ट होली गायन की प्रतियोगिताओं का भी आयोजन होता है। जबकि कई स्थानों पर फूलडोल के मेले भी लगते हैं।

 




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