पितृ पक्ष श्राद्ध

जानिए आखिर क्या होगा है पितृ पक्ष अथवा श्राद्ध?

ज्योतिषाचार्य पं. दयानन्द शास्त्री, उज्जैन

व्यक्ति अपने पितरों के प्रति श्रद्धा के साथ अर्पित किया गया तर्पण अर्थात जलदान पिंडदान पिंड के रूप में पितरों को समर्पित किया गया भोजन यही श्राद्ध कहलाता है। धर्म शास्त्रों की ऐसी मान्यता है सूर्य के कन्या राशि में आने पर परलोक से पितर अपने स्वजनों यानी पुत्र, पौत्रों के साथ रहने आ जाते हैं इसलिए इसे कनागत भी कहा जाता है। देवताओं से तुलना करने पर व्यक्ति के तीन पीढ़ी के पूर्वज गिने जाते हैं । इसमें पिता को वसु के समान, रुद्र दादा के समान तथा आदित्य को परदादा के समान माना गया गया है। श्राद्ध के समय सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। श्राद्ध तीन पीढ़ियों तक करने का विधान बताया गया है।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. दयानन्द शास्त्री ने बताया की हिंदू शास्त्रों में कहा गया है कि जो स्वजन अपने शरीर को छोड़कर चले गए हैं चाहे वे किसी भी रूप में अथवा किसी भी लोक में हों, उनकी तृप्ति और उन्नति के लिए श्रद्धा के साथ जो शुभ संकल्प और तर्पण किया जाता है, वह श्राद्ध है। माना जाता है कि सावन की पूर्णिमा से ही पितर मृत्यु लोक में आ जाते हैं और नवांकुरित कुशा की नोकों पर विराजमान हो जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष में हम जो भी पितरों के नाम का निकालते हैं, उसे वे सूक्ष्म रूप में आकर ग्रहण करते हैं। केवल तीन पीढ़ियों का श्राद्ध और पिंड दान करने का ही विधान है। पुराणों के अनुसार मुताबिक मृत्यु के देवता यमराज श्राद्ध पक्ष में जीव को मुक्त कर देते हैं, ताकि वे स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। श्राद्ध पक्ष में मांसाहार पूरी तरह वर्जित माना गया है। श्राद्ध पक्ष का माहात्म्य उत्तर व उत्तर-पूर्व भारत में ज्यादा है। तमिलनाडु में आदि अमावसाई, केरल में करिकडा वावुबली और महाराष्ट्र में इसे पितृ पंधरवडा नाम से जानते हैं। श्राद्ध स्त्री या पुरुष, कोई भी कर सकता है। श्रद्धा से कराया गया भोजन और पवित्रता से जल का तर्पण ही श्राद्ध का आधार है।

ज्यादातर लोग अपने घरों में ही तर्पण करते हैं। श्राद्ध का अनुष्ठान करते समय दिवंगत प्राणी का नाम और उसके गोत्र का उच्चारण किया जाता है। हाथों में कुश की पैंती (उंगली में पहनने के लिए कुश का अंगूठी जैसा आकार बनाना) डालकर काले तिल से मिले हुए जल से पितरों को तर्पण किया जाता है। मान्यता है कि एक तिल का दान बत्तीस सेर स्वर्ण तिलों के बराबर है। परिवार का उत्तराधिकारी या ज्येष्ठ पुत्र ही श्राद्ध करता है। जिसके घर में कोई पुरुष न हो, वहां स्त्रियां ही इस रिवाज को निभाती हैं। परिवार का अंतिम पुरुष सदस्य अपना श्राद्ध जीते जी करने के लिए स्वतंत्र माना गया है। संन्यासी वर्ग अपना श्राद्ध अपने जीवन में कर ही लेते हैं। श्राद्ध पक्ष में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं। श्राद्ध का समय दोपहर साढे़ बारह बजे से एक बजे के बीच उपयुक्त माना गया है। यात्रा में जा रहे व्यक्ति, रोगी या निर्धन व्यक्ति को कच्चे अन्न से श्राद्ध करने की छूट दी गई है। कुछ लोग कौओं, कुत्तों और गायों के लिए भी अंश निकालते हैं। कहते हैं कि ये सभी जीव यम के काफी नजदीकी हैं और गाय वैतरणी पार कराने में सहायक है।

हिंदू धर्म ग्रंथों में मनुष्य के ऊपर तीन तरह के ऋण बताए गए हैं। देव, ऋषि तथा पितृ ऋण और इन सभी में पितृ ऋण के निवारण के लिए 15 दिनों के पितृ पक्ष में पितृ यज्ञ करने यानी श्राद्ध कर्म का वर्णन किया गया है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा से अश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक के समय को पितृ पक्ष कहा जाता है और इसी 15 दिनों के अंदर श्राद्ध कर्म कर पितरों को जलदान, पिंड दान की प्रक्रिया की जाती है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. दयानन्द शास्त्री ने बताया की श्राद्ध पितृ पक्ष के अंतिम दिन यानी अमावस्या या महालया अमावस्या के रूप में जानी जाती है। महालया अमावस्या पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। जिन लोगों को अपने पूर्वजों या पितरों की पुण्यतिथि का सही दिन ज्ञात नहीं होता है। ऐसे पूर्वजों को इस दिन श्रद्धांजलि और भोजन समर्पित कर याद किया जाता है।




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