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ज्ञान और विराग की मां है भक्ति : नारायाण गिरि

मित्रो आज संतों के दर्शन करने का सौभाग्‍य मिला। यह पूर्व दिल्‍ली के चिल्‍ला गांव निवासी पंडित घनश्‍याम तिवारीजी के प्रेम की वजह से संभव हुआ। हुआ यूं कि बैरागी बाबा बालकदास महात्‍यागीजी महाराज मलेरिया की चपेट में आ गए। वह आजकल उत्‍तर प्रदेश के महामाया नगर यानि की हाथरस में महात्‍यागियों के आश्रम में साधनारत हैं। तबीयत ज्‍यादा बिगड़ने पर दिल्‍ली आ गए। दिल्‍ली में करीब डेढ़ दशक से ज्‍यादा समय वह मयूर विहार फेस वन के आचार्य निकेतन स्थिति पंचमुखी हनुमान मंदिर में रहे हैं। सो उनसे पुराना परिचय है। बालकदास सीधे तिवारीजी के घर पहुंचे। सूचना मिलने पर तिवारीजी के साथ हम उन्‍हें डाक्‍टर के यहां ले गए। डाक्‍टर साहब उनके पुराने शिष्‍य हैं। सो उन्‍होंने दवाईयां भी बाजार से खुद मंगा कर बाबा को दी। आराम मिलने पर आज शाम को हमें पंचदस नाम जूना अखाड़ा तेरह मही बड़ा हनुमान घाट काशी से संबंधित श्रीपंचमुखी हनुमान मंदिर ले गए। यह मंदिर न्‍यू अशोक नगर और टकसाल नौएडा सैक्‍टर एक में स्थिति है। मंदिर की एक तरफ अशोक नजर और दूसरी तरफ नौएडा है। मंदिर के महंत थानापति श्री नारायण गिरि महाराज के दर्शन हुए। इस दौरान महाराजजी के साथ धर्मचर्चा का भी सौभाग्‍य मिला। महंत जी की मुखारबिंदु से निकली अमृत वाणी से मन गद गद हो गया। मंदिर के इतिहास और महंत जी के बारे में जल्‍द ही मुक्तिधाम के पाठकों को narayangiri2-muktidhamविस्‍तार से बताएंगे। फिलवक्‍त उनकी अमृत वाणी के कुछ अंश आपसे साझा कर रहे है।

 देखिए, हम जिस युग में रह रहे हैं। उसमें झूठ फरेब और आडंबरों का बोलवाला है। भौतिक सुखों की चाह में जीव इस नश्‍वर शरीर के मोहपाश में फंस गया है। वह मंदिरों में जाता है तो सवा रुपये का प्रसाद चढ़ाने के बदले भगवान से सवा लाख का फायदा पाने की लालसा रखता है। यहीं ले लो हनुमान जी के सामने अपने परिवार बच्‍चों की भहबूदी व्‍यापार से लेकर भौतिक सुखों की कामना करता है। मन नहीं भरता तो महंत जी से वहीं मांग दुहराएगा। लेकिन अपने मोक्ष की उसे कोई चिंता नहीं। कभी न भगवान से अपने मोक्ष की कामना करेगा न संत-महंतों से मोक्ष की राह पूछने का प्रयास करेगा। यही कारण है कि उसे चमत्‍कारी बाबाओं, आडंबरियों कथावाचकों के जलसों में आनंद आता है। अब आप देखिए कि शुकदेवजी जी ने एक बार यानि की सात दिन  श्रीमदभागवत कथा  सुना कर राजा परीक्षित को मोक्ष दिला दिया। लेकिन आजकल देखो गली गली मौहल्‍ले मौहल्‍ले श्रीमदभागवत कथाओं की बाढ़ आ गई है। वेदव्‍यासों के तो कहने ही क्‍या। कथा कराने वाले और करने वाले दोनों की कीमत फिक्‍स हो गई है। भागवतकथाओं में श्रोताओं को भी चटक मटक में आनंद आ रहा है। सच जानने की किसी को जरूरत नहीं है। कथाओं में ऐसे ऐसे दृष्‍टांत दिए जा रहे हैं जिनका मूल भागवत से कोई लेना देना नहीं। श्रीमदभागवत कथाओं में कमर मटकाना परमानंद का प्रतीक हो गया है। कथाओं के लाईव प्रसारण हो रहे हैं। सबको प्रचार चाहिए। वेदव्‍यासों को भी और कथा कराने वाले यजमानों को भी। संत इस नजारे को दूर से देख रहे हैं। उन्‍हें भीड़ और प्रचार से क्‍या लेना-देना। मंदिर में एक सेठ आते हैं। एक दिन कहने लगे महाराज तीन बेटे हैं। तीनों के शादी कर दी। काम धंधा शुरू करा दिया। तीनों के रहने के लिए अलग अलग मकान बनवा कर दे दिए। पत्‍नी की ओर इशारा करते हुए बोले तानों को एक नौकरानी भी दे रखी है। मेरी किराये की अच्‍छी आय है। उसमें से भी तीनों ने हिस्‍से बांट लिए हैं। फिर भी उनकी निगाह मेरे उस मकान पर लगी है। जिसमें मैं और पत्‍नी रहते हैं। कहते हैं कि इसका और तीनों में बंटबारा कर दो। मुझे पता है कि जो मुझसे कह रहे थे। वही व्‍यथा हनुमानजी से कहते होंगे। सबकी चिंता है पर ये चिंता नहीं कि मुझे परमगति कैसे प्राप्‍त होगी।

कहने लगे जितने भी अमीर देख रहे हो । ये अमीर नहीं दिल से गरीब हैं। दिल से तो फकीर अमीर होता है। उसके पास कुछ नहीं लेकिन, फिर भी कोई गिला नहीं। इसे कहते हैं दिल का अमीर। वह फकीर ही क्‍या जो दिल से अमीर न हो। जब घर बार रिश्‍ते नाते अपने सब छोड़ दिए फकीर हो गए फिर काहे की चिंता। लेकिन आजकल फकीर के बाने में भी लोग मोह माया की फांस में उलझे हुए हैं। संत तो निर्विकार होता है। उसे आडंबरों से क्‍या लेना-देना। हजारों नहीं लाखों में मुश्किल से कोई संत दर्शन की लालसा में तड़पता है। यह भक्ति से संभव होता है। भक्ति जिसे होगी उसे  विराग भी होगा। माता पिता ,भाई बहिन , पत्‍नी पुत्र’पुत्रियां हो या यार दोस्‍त उसकी किसी से बनेगी ही नहीं। सबसे उसे विराग होने लगेगा। ऐसा व्‍यक्ति संतों के दीदार के लिए तड़फता है। इसीलिए भक्ति को ज्ञान और विराग की मां कहते हैं। भक्ति के लिए इच्‍छाओं पर काबू पाना। इच्‍छाओं का दमन करना पड़ता है। यह सहज काम नहीं है। काम इच्‍छाओं को जाग्रत करता है। इच्‍छा पूरी नहीं होने पर क्रोध आता है। क्रोध विनाश की निशानी है। यही कारण है कि गोस्‍वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है कि जहां सुमित तहां संपित नाना। जहां कुमित तहां विपति निदाना।। इस दौरान वह खुद को अनपढ़ और गंवार बताने का प्रयास करते हैं। तुलसी और सूरदास के संत बनने का प्रसंग सुनाते हैं। कहते हैं कि दोनों ही प्रेयसियों से दुत्‍कारे जाने पर मूल तत्‍व को पहचानते हैं और इतिहास पुरुष बन जाते हैं। मैं खुद को रोक नहीं माता पूछ बैठता हूं महाराज संत को कैसे पहचाना जाए। कहने लगे कि जब पहली दृष्टि में हनुमान जी कालनेमि राक्षस को नहीं पहचान पाए और रामधुन के प्रेम के मोह में कालनेमि को संत समझ बैठे तो तुम संत को कैसे पहचानोगे। वैसे भी आजकल तो कालनेमियों की बाढ़ आई हुई है। फिर कहते हैं कि संत कि पहचान उसके आचरण से व्‍यवहार से चाल चलन से स्‍वत: हो जाती है। संत को वाहवाही लूटने, लोगों को चमत्‍कार दिखाने की जरूरत नहीं होती। संत तो बहती धारा है।

    देश की मौजूदा दशा के बारे में कहते हैं कि हमें राजनीति से क्‍या लेना-देना। हमारे लिए सब एक जैसे है। लेकिन वर्तमान दौर में राक्षसी प्रवृर्ति हॉवी है। सतयुग द्वापर त्रेता में धर्म की पताका लहराती है। कलयुग में तामसी प्रवृतियों का बोलबाला रहता है। वही इस समय हो रहा है। हालात विश्‍वयुद्ध मतलब एक बार फिर महाभारत की ओर जा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नजरिए से वह संतुष्‍ट हैं। कहते है मोदी का भी अपना घर है न ठिकाना। वह भी त्‍यागी पुरुष है।




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