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आस्था के आयाम : बद्रीनाथ – केदारनाथ

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चारधाम की यात्रा एक ऐसा रोमांचकारी अनुभव है कि जब इसके दृश्य स्मृति पटल पर उभरते हैं तो कलम खुद-ब खुद चलने लगती है एक नए सृजन के लिए ऐसी ही समृतियां हमसे सांझा कर रहे हैं। दैनिक जागरण पत्र समूह के पूर्व मुख्य महाप्रबंधक एंव पूर्व स्थानीय संपादक निशिकांत ठाकुर
देवभूमि उत्तराखंड ही ऐसी जगह है जहां प्रकृति और उसका कृतिकार दोनों एक साथ मौजूद हैं। पहाड़, नदी, झरने, हर तरफ हरियाली तथा सुंदर मौसम सभी यहां एक साथ उपलब्ध हैं। धामों के साथ-साथ यहां कई प्राकृतिक और ऐतिहासिकस्थल भी दर्शनीय है। हमने अपनी यात्रा दिल्ली से शुरू की, यहां से भारत के अंतिम गांव माणा की दूरी 533 किलोमीटर है। दिल्ली से माणा के रास्ते पर हरिद्वार और ऋषिकेश सहित पांच प्रयाग तथा बद्रीनाथ व केदारनाथ जैसे धार्मिक-आध्यात्मिक मह्त्व के कई तीर्थ पड़ते हैं। इस रास्ते में छोटे-बड़े मंदिरों और धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व के अन्य दर्शनीय स्थानों की गिनती तो करनी ही मुश्किल है।
हमने सुबह बहुत जल्दी ही यात्रा शुरू की। हरिद्वार में हर की पौड़ी पहुंचकर हमने गंगा में डुबकी लगाई। वहां से स्नान-पूजन के बाद हमने ऋषिकेश की ओर रुख किया। ऋषिकेश जाने में करीब एक घंटे का समय लगता है। आश्रमों, साधु-संतों और मंत्रों के साथ-साथ लक्ष्मण झूला व राम झूले
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के लिए प्रसिद्ध ऋषिकेश का अपना अलग ही महत्व है। ऋषिकेश से दो रास्ते निकलते हैं। एक यमुनोत्री व गंगोत्री की तरफ और दूसरा माणा या बद्रीविशाल के लिए।। माणा वाला रास्ता बिल्कुल सीधा है।

हम पहले बद्रीनाथ के लिए सीधी सड़क पर चले। इस रास्ते पर चलकर हम सीधे देव प्रयाग पहुंचे यहां भागीरथी और अलकनंदा का संगम होता है। पहाड़ी नदियों का संगम देखने का यह पहला अनुभव था। इसका दर्शन हमें प्रकृति के प्रति न केवल रोमांच अपितु एक अलग तरह की आध्यातमिक अनुभूति से भर देता है। ये संगम देखने के बाद हम आगे बढ़े रात्रि विश्राम हमने पौड़ी जिले के श्रीनगर में किया। विश्राम के लिए यहां कई धर्मशालाओं एवं होटलों की व्यवस्था है। यहां से फिर हम आगे बढ़े और रूद्रप्रयाग पहुंचे। अलकनंदा और महानंदा के संगम पर बसे इस कस्बे में कई देव स्थल हैं। प्रकृति की सुंदरता देखते ही बनती है। हम यहां से केदारनाथ की तरफ बढ़े। रास्ते में सोमप्रयाग नामक तीसरे संगम को भी देखने का सुख मिला। यह सोनगंगा व मंदाकिनी नदियों का संगम है। यहां से आगे बढ़ते है तो गुप्तकाशी नामक दर्शनीय तीर्थस्थल है। रूद्रप्रयाग से कुल 76 किलोमीटर की दूरी तय कर हम गौरी कुण्ड पहुंचे। कहा जाता है कि मां गौरी ने इसी स्थल पर बैठकर तपस्या की थी। इसीलिए यह स्थल विशेष पूजनीय है।

यहां एक तप्त कुंड है जिसमें स्नान का अपना अलग ही आनंद है। यदि यहां शाम को पहुंचा जाये तो रात्रि विश्राम के लिए लसज बना हुआ है। प्रातः तप्त कुण्ड मेंस्नान करने के बाद हर-हर महादेव के उदघोष के साथ हमारी यात्रा महादेव के धाम केदारनाथ को शुरू हुई। चौदह किलोमीटर की इस यात्रा में बाबा केदारनाथ महादेव के विभिन्न नामों का स्मरण करते हुए श्रद्धालु यहां से आगे बढ़ते हैं। आगे की यात्रा के लिए घोड़े, पालकी की भी व्यवस्था है।

चूंकि रास्ता कठिन है, अतः घोड़े की सवारी ही उचित होती है। इस रास्ते पर बिलकुल बीच में सात किलोमीटर पर रामबाड़ा नामक स्थल है, जहां बिड़ला जी की धर्मशाला के अलावा उत्तरांचल सरकार की भी धर्मशाला यात्रियों के ठहरने के लिए है। यहां हम नाश्ता आदि भी कर सकते हैं। फिर यात्रा का अंतिम पड़ाव बाबा केदारनाथ का दर्शनास्थल आता है, जहां से मंदिर के दर्शन होते ही श्रद्धालु सारे कष्ट भूलकर जोर-शोर से जयकारा लगाने लगते हैं।

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फिर आता है वह क्षण जब हम मंदिर के पास होते हैं। यहां ठहरने के लिए धर्मशालाओं की कमी नहीं है। यहां आप भोजन कर सकते हैं और आराम के लिए भी यहां उचित व्यवस्था है। फिर पहले सायंकाल की आरती में शामिल होते हैं। प्रातः काल पूजन-अर्चन के बाद वापसी में हम फिर नीचे गौरीकुंड पहुंचे और वहां से फिर 76 किलोमीटर का सफर तय कर वापस रूद्रप्रयाग आए। वहां से बद्रीनाथ के लिए हमारी यात्रा शुरू हुई।

रूदप्रयाग से हम करणप्रयाग की ओर चले। कर्णप्रयाग पिडारगंगा और अलकनंदा नदियों का संगम है। और यह रुद्रप्रयाग से 34 किलोमीटर दूर है। इस पावन तट के आगे नंद प्रयाग है, जो मंदाकिनी और अलकनंदा नदियों का संगम है। इसके आगे जोशी मठ आता है, जिसे ज्योतिर्णठ भी कहते हैं। और बद्रीनाथ की गद्दी भी यहां है। यहां शंकराचार्य का मठ तथा ओली तक जाने के लिए रोप वे तैयार है। पुराणों में वर्णित कल्पवृक्ष नरसिंह मंदिर तथा वासुदेव मंदिर जैसे दर्शनीय स्थल यहां हैं। (ओली स्केटिंग स्थल है) । जोशीमठ में तमाम पवित्र मंदिरों के दर्शन के बाद आगे जाने के लिए एकतरफा सड़क है। एक निश्तिच समयांतराल के बाद यहां से 100 गाड़ियों का जत्था बद्रीनाथ के लिए छोड़ा जाता है। आगे की यात्रा शुरू करते ही 30 किलोमीटर पर आखिरी प्रयाग विष्णुप्रयाग आता है, यहां धौलीगंगा व अलकनंदा का संगम होता है। यदि आप हेमकुंट साहिब अथवा फूलों की घाटी जाना चाहें तो यहां से जा सकते हैं। हेमकुंट साहिब की ऊंचाई समुद्रतट से 4300 मीटर है।

इसी मार्ग पर आगे पांडुकेश्वर के मंदिर हैं। कहा जाता है कि सर्दियों के दौरान बद्रीनाथ इसी मंदिर में आ जाते हैं। इसके आगे हनुमान चट्टी है। और फिर हम पहुंचते हैं उस स्थल पर जिसके लिए हमारे मन में असीम इच्छाएं थीं। जयकारों के बीच पहाड़ों के पीछे से निकलकर जैसे ही हम बाहर आए, हमें वहां परम धाम बद्रीनाथ के दर्शन मिले।

यहां से यदि समय बचे तो देश के आखिरी गांव माणा जाया जा सकता है। पौराणिक नदी सरस्वती के उदगमस्थल को भी वहीं देखा जा सकता है कथा है कि जब युधिष्ठिर स्वर्गारोहण के लिए जा रहे थे तो वहां रास्ते में सरस्वती नदी पड़ी। चूंकि स्त्री का लंघन नहीं किया जा सकता, इसलिए भीमसेन ने एक पत्थर उठाकर नदी पर रखा फिर उसे पार करके स्वर्गारोहरण के लिए आगे बढ़े। आज भी वह पत्थर वहां मौजूद है। और उसका उपयोग पुल के रूप में किया जाता है। इसी गांव में वेदव्यास की कुटिया भी है। यहीं उन्होंने गणेश जी के वेदों की ऋचाएं सुनाई और गणेश जी ने वेदों को लिपिबद्ध किया। उसके ठीक आगे ही वह स्थान भी है जहां बैठकर गणेश जी ने वेदों को लिपिबद्ध किया था।

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श्री केदारनाथ महात्म्य

व्यास समृति के अनुसार जो व्यक्ति केदारनाथ की तार्थ यात्रा करता है वह मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। महाभारत के वन पर्व के वर्णनानुसार केदार कुण्ड में स्नान करने पर समस्त पापों का क्षय हो जाता है इस विषय पर यहां विस्तृत वार्ता करते हुए कहा गया है कि कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन यहां का दर्शन अर्चन करने के परिणामस्वरूप व्यक्ति को स्वर्ग की उपलब्धि हुआ करती है। वामन पुराणानुसार केदारनाथ के क्षेत्र में निवास करने से तथा डीडी (रूद्र) की पूजा करने से मनुष्य अकस्मात ही स्वर्गाधिकारी हो जाता है।

लिंग पुराण के मतानुसार जो मनुष्य संन्यास ग्रहण करके केदार कुण्ड में निवास करता है वह शिव समान हो जाता है। कर्मपुराण का वक्तव्य है कि महालय तीर्थ में स्नान करने और केदारनाथ का

गरुड़ पुराणानुसार केदारनाथ की तीर्थ करने से समस्त पापों का क्षय हो जाता है। महाभारत ग्रंथ केदारनाथ की महिमा का उपदेश प्रदान करते हुए वर्णन करता है कि जगत में सात सरस्वती है जो कि सुप्रभा के नाम से पुष्कर में, कांचीनाक्षी के नाम से नैमिषारण में, विशाला के नाम से गया में, मनोरमा के नाम से अशेधया में, ओघवती के नाम से कुरुक्षेत्र में, सुरेश के नाम से गंगाद्वार में तथा बिमलोदकी के नाम से हिमालय पर स्थित है। जो व्यक्ति केदारांचल पर गमन करके ( प्राकृतिक) मृत्यु को प्राप्त होता है वह निश्चय शिवलोक पहुंचता है।

पह्म पुराण, इस महात्म्य में एक और विशेषता संलग्र करते हुए स्पष्ट करता है कि जब कुंभ राशि पर सूर्य तथा गुरू ग्रह स्थित हो तब केदारनाथ का दर्शन तथा स्पर्श मोक्ष प्रदान करता है। ( कुंभ राशि में सूर्य फरवरी मास के अंतर्गत भ्रमण करता है)। हमारे सनातन धर्म में एक विशेष महापुराण है जिसे स्कंद पुराण कहा जाता है। इसके अनेक अंश दुर्लभ हो चुके हैं। इसी पुराण में केदार महात्म्य भी स्पष्ट किया गया है।

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श्री बद्रीनाथ महात्म्य

अरुन्धती जी ने कहा हे स्वामिन! सर्व प्राणियों के हित की इच्छा और मेरी प्रीति के लिए श्री बद्रीनाथ महात्म्य को कृपा पूर्वक कहिए, जिस महात्म्य को शिवाजी ने पार्वती जी से कहा था। हे तपोनिधे! वह बद्री क्षेत्र कितना बड़ा है और वहां जाने से क्या-क्या फल प्राप्त होते हैं| इस सब को विस्तार पूर्वक मेरे से करिएसूतजी बोले है शौनक! इस प्रकार अरूधंती के वचन सुनकर क्षण मात्र भगवान का ध्यान कर वशिष्ट जी कहने लगे कि हे प्रिये! यर्व साधारण व्यक्ति भी श्री बद्रीनाथ के दर्शन कर मुक्ति को प्राप्त हो जाता है। जिसने सैंकड़ों जन्म भगवान की आराधना की हो, उसी को श्री बद्रीनारायण भगवान के दर्शन होते है। वह एक ही जन्म में बिना जप,तप मोक्ष पद को प्राप्त हो जाता है। जो कोई प्रसंग से ही बद्री-बद्री

जो पुरुष महापापी हो और कहीं भी उसके पाप नष्ट न हों यहां आने मात्र से उस पातकी के सारे पाप क्षण भर में ही छूट जाते हैं। जो कोई श्री बद्रीनाथ भगवान को पंचगव्य से स्नान कराकर वस्त्राभूषण भेंट करता है, वह सदा बैकुण्ठ में वास करता है। हे अरुंधती! जो कोई एक मुट्ठी भर भी नैवेध अर्पित करता है वह एक राज्य का अधिकारी हो जाता है और जो कोई अखण्ड दीपदान करता है वह बड़ा भाग्यवान होता है। जिस प्रकार भगवान विष्णु के बराबर अन्य कोई देवता नहीं है।

हे प्रिये! जो कोई भी बद्रीनारायण की परिक्रमा करता है उसे पृथ्वी दान का फल मिलता है और जो कोई तप्तकुण्ड में स्नान कर भगवान का ध्यान करते हुए श्री बद्रीनारायण के दर्शन को जाता है तो देवता भी नतमस्तक होकर उसकी स्तुति करते हैं। और करते हैं कि हे पुण्यात्मा! तुम्हारे एक-एक पग चलने से अश्रमेध यज्ञ का फल होता है। और जो कोई बद्रीनाथ भगवान का चरणामृत और प्रसाद ग्रहण करता है वह तीन लोक में धन्य है। निर्विकार, नित्यानंद,परमज्ञानी विष्णु भी यहीं हैं । इसिलिए पुरूष भक्ति पूर्वक इन्हीं का ध्यान करें ।

 कैसे पहुंचे केदारनाथ

उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग जिले में पड़ने वाले केदारनाथ धाम के लिए हरिद्वार से 165 किलोमीटर तक पहले रूद्रप्रयाग या ऋषिकेश आना पड़ता है जो कि चारधाम यात्रा का बेसकैंप है। इसके बाद ऋषिकेश से गौरीकुंड की दूरी 76 किलोमीटर है। यहां से 18 किलोमीटर की दूरी तय करके केदारनाथ के धाम पहुंच सकते हैं। गौरीकुंड से जंगलचट्टी 4 किलोमीटर है। उसके बाद रामबाड़ा नामक जगह पड़ती है और फिर अलगा पड़ाव पड़ता है लिनचैली। गौरीकुंड से यह जगह 11 किलोमीटर दूर है। लिंचैली से लगभग 7 किलोमीटर की पैदल दूरी तय करके केदारनाथ पहुंचा जाता है। केदारनाथ धाम और लिंचैली के बीच नेहरू परिवतारोहण संस्थान ने 4 मीटर चौड़ा सीमेंटेड रास्ता बना दिया है, ऐसे में श्रद्धालु आसानी से केदारनाथ धाम पहुंच सकते हैं।

कैसे पहुंचे बद्रीनाथ

बद्रीनाथ हाईवे पर कई स्लाइडिंग जोन बाधा बनते रहे हैं। इसमें से जहां सिरोहबगड़ नामक स्लाइडिंग जोन का ट्रीटमेंट सरकार करा रही है और इसके बाधित होने पर इसका बाईपास तैयार किया जा रहा है। वहीं लामबगढ़ में टनल के जरिए यात्रा का बाईपास बनाने की बात सरकार कर रही है। इस बार सरकार ने इस स्लाइडिंग जोन के दोनों तरफ सप्लाई के लिए मशीनें तैयार कर रही हैं। पूरे चारधाम यात्रा में 271 संवेदनशील क्षेत्रों पर भी प्रशासन सावधानी बरतने की बात कर रहा है। बद्रीनाथ तक गाड़ियां जाती हैं, इसलिए यहां मौसम अनुकूल होने पर पैदल नहीं जाता पड़ता। बद्रीनाथ धाम को बैकुण्ठ धाम भी कहा जाता है। बैकुण्ठधाम जाने के लिए ऋषिकेश से देवप्रयाग, श्रीनगर, रूद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, चमोली, गोविंदघाट होते हुए पहुंचा जाता है।




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