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सब ठाकुर की माया है – श्री श्री 1008 श्रीरामकृष्ण दास महात्यागीजी महाराज

श्रीराम हनुमान वाटिका के मुखिया श्री श्री 1008 श्रीरामकृष्ण दास महात्यागीजी महाराज से वाटिका एवं स्वयं के जीनव से जुड़े मुद्दों पर हमारे संपादक ने खुलकर बातचीत की। प्रस्तुत है इस बातचीत का ब्यौरा

प्रश्न- महाराजजी सन्यास का भाव कैसे पैदा हआ क्या बालपन से ही मन बैरागी था या फिर घर का वातावरण ऐसा था कि गृहस्थ रास नहीं आया अथवा कोई ऐसी घटना हुई जिसने बालक मन को बैरागी बना दिया?

उत्तर- देखिए न तो बचपन में मन बैरागी था और नहीं ऐसी कोई घटना हुई जिससे मन बैरागी हो गया। हां घर का वातावरण जरूर आध्यात्मिक था। पिताजी और माताजी बड़ी ही धर्मपरायण स्वभाव के थे। सुबह से ही घर में पूजा-पाठ का सिलसिला शुरू हो जाता था। पूजा पाठ के बाद प्रसाद मिलता था। बालकर मन में जल्दी उठकर स्नान आदि कर हमेशा सभी भाई-बहनों से पले प्रसाद लेने का उत्साह रहता था। इन सब का बालक मन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि गृहस्थ से पूर्व ही घर त्याग दिया। उसकी एक वजह यह भी थी कि घर के वातावरण से ऐसा लगता था कि भाईयों में से कोई भी कभी भी गृहस्थ का त्याग कर सकता है। और ऐसा होने पर उन्हें गृहस्थ के जंजाल में फंसा दिया जाएगा। इससे डर कर तीन बार घर से भागा पर किसी न किसी वजह से हर बार घर वापस आ गया पर चौथी बार भागा तो फिर कभी मुड़कर घर की ओर नहीं देखा।

प्रश्न- महाराजजी जब आखिरी बार घर छोड़ा तब क्या अवस्था थी?
उत्तर- यही कोई चौदह बरस की अवस्था रही होगी।

प्रश्न- ईश्वर की प्राप्ति के लिए क्या सन्यास जरूरी है? गृहस्थ में रहते हुए क्या ईश्वर का सामीप्य हासिल करना सहज सुलभ नहीं है?
उत्तर- ईश्वर की प्राप्ति के लिए सन्यास भाव तो आवश्यक हैं। पर किसके लिए गृहस्थ छोड़ना कोई जरूरी नहीं है। गृहस्थ जीवन में भी सन्यास का भाव हो सकता है। हमारे शास्त्र साक्षी हैं कि समाम ऐसी विभूतियां संत पुरूष हुए हैं जिन्होंने गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए ईश्वर का सामीप्य हासिल किया है। मैं तो हमेशा यह तहता हूं कि गृहस्थ से बड़ा कोई तप नहीं है। त्रेता युग में स्वयं नारायम भगवान ने रामावतार के जरिए सदाचारी जीनव व्यतीत कर इस दृष्टिकोंण को पुष्ट किया है। सामाजिक जीवन की

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मर्यादाओं का पालन करते के कारण उन्हें मर्यादा पुरूषोत्तम कहा जाता है।

प्रश्न- अच्छा महाराजजी यह बताइये कि दिल्ली कैसे आना हुआ? यहां स्वयं आये या हनुमानजी आपको खींच लाए?
उत्तर- घर त्यागने के बाद काफी समय इधर-उधर भटकता रहा। फिर अचानक मन में दिल्ली जाने का भाव जाग्रत हुआ और 1966 में दिल्ली पहुंच गया। दिल्ली पहुंचने के बाद सबसे पहले यमुना मैया में डुबकी लगाई। स्नान के बाद यमुना किनारे स्थित श्रीमनोकामना सिद्ध हनुमानजीके मंदिर पर आया तो पैरों के झुलसने से अहसास हुआ कि गाट का फर्श धूम से गरम था। इसके बाद हनुमानजी को लंबी दण्डवत किया। दष्डवत करके जैसे ही उठा लगा कि किसी ने मुझे आवाज दी। मैने पीछे मुड़कर देखा तो मंदिर में बैठे प्रकाशपुंज से लवरेज एक बाबा प्रयागदासजी थे मैं

उनके संमोहन में खिंचा चला गया। अजीब सा आकर्षण था उनके व्यक्तित्व में। दरअसल यही वह गुरूदेव थे जिनकी तलाश में मैं घर त्यागने के बाद भटक रहा था। पास पहुंचने पर उन्होंने मुझसे पहला प्रश्न किया कि क्या साधु हो। मैंने प्रति-उत्तर में कहा कि नहीं महाराज में साधु तो नहीं हूं पर साधु बनना चाहता हूं। उन्होंने कहा कि फिर तुमने श्रीहनुमानजी महाराज को ऐसी मुद्रा में दण्डवत कैसे की, क्योंकि ऐसी दण्डवत् तो प्राय साधु-संत ही करते हैं। मैंने कहा कि महाराज मुझे तो श्रीहनुमानजी महाराज को प्रणाम करना था सो कर लिया । इसके बाद कुछ प्रारंभिक पूछताछ के बाद बाबाजी ने अपने सानिध्य में रहने की मूक अनुमति दे दी।
प्रश्न बाबा प्रयागदासी से जुङा कोई प्रसंग जो आपके मन में अभी तक विधमान हो ?
उत्तर- गुरुजी के बारे में क्या कहा जाए । वह कुछ अलग ही प्रवृर्ति के थे । सांसारिक चीजों से तो उनको किंचत भी लगाव नही था । गुरूजी का सानिध्य प्राप्त होने के बाद लगा कि जिस उद्देश्य से भटक रहा था वह पूरा हो गया। मेरा यह सौभाग्य रहा कि मुझे उनका विशेष स्नेह मिला । उन्होंने प्रारंभ से ही मुझसे वह सब कार्य कराये जिन्हें हम प्राय : दीन -हीन समझे जाने वाले लोगों से कराते है । वह समझाना चाहते थे कि दीन – हीन और श्रेष्ठ भी के प्रति समान भाव रखें । साधना भजन पूजा के बारे मे भी उनकी स्पष्ट हिदायत थी जो भी करना है अपने अंतकरण के आंनद के लिये कर । ठाकुर को सुनाना हैं या रामायण सुनानी है तो सुनाने वाले और सुनने वाले के अलावा किसी तीसरे को इसका अहसास नहीं होना चाहिए । बालस्वभाव के चलते एक दिन में किसी से धर्म चर्चा करने लगा उन्होंने देखते ही टोक दिया दूसरे को प्रवचन सुनाकर माया को ठगेगा क्या! केवल अपने अंतकरण को देख । मकलब किसी से बात तक नहीं करने देते थे । इस सब के पीछे उनकी मुख्य दृष्टि यह थी कि सच्चे साधक के मन में सांसारिक चीजों मसलन धन- मान- प्रतिष्टा के प्रति मोह नहीं बैरागी भाव रहना चाहिए। यह मोह साधना में बङा बाधक है । गुरूजी (बाबाजी) तो तिलक और श्रृंगार के भी सख्त खिलाफ थे । विशेष कर हमारे लिये यह उनकी खास कसौटी थी । बाबाजी मेरा कितना ध्यान रखते थे इस संबधं में मुझे एक प्रसंग याद आता है। वर्ष 1978-79 की बात है । महाराष्ट्र का एक मालेगांव क्षेत्र है । यह मुस्लिम बहुमूल्य है । वहां बाबाजी य़ज्ञ कर रहे थे । खास बात यह थी कि वंहा रामनामी दुप़ट्टा ओढकर पहुंच गया । उस समय तो बाबाजी कुछ नहीं बोले लेकिन दूसरे दिन बडे नाराज हुए। बोले,लेकिन दूसरे दिन बङे नाराज हुए । बोले कि तूने ये क्या ओढ रखा है? मैने जवाब दिया कि बाबाजी यह तो रामनामी है । इस पर बाबाजी ने जमकर ङांट लगाई । तूझे रामनाम दिखाई नही देता । रामनाम को ओडना है तो अपने कण -कण में बसा । इस रामनामी दुपट्टे से क्या होगा!। सच कहूं तो बाबाजी की इसी कसौटी ने मेरे जीवन का दृष्टिकोंण बदल दिया ।

प्रश्न अच्छा महाराजजी यह बताइये कि गुरूजी का सानिध्य प्राप्त होने के बाद क्या किशोर मन में देशाटन का भाव जागत नहीं हुआ ?
उत्तर- जैसा कि मैने पहले बताया कि में 1966 में कुछ समय तंत्र -मंत्र वालों के संपर्क में रहा । गुरूजी के सानिध्य में रहनें के दौरान ही एक बार मेरे किशोर मन में यहां से भाग पैदा हुआ। गुरुजी तो अंर्तयामी थे। उन्होने झट तड लिया फिर मुझे गुरूजी ने यात्रा पर जाना जाता है। जा य़ात्रा कर आ। इस तरह मुझे गुरूजी ने यात्रा पर भेज दिया । यमुना किनारे वाले मनोकामना सिध्द हनुमान मंदिर के जो वर्तमान महंत है। य़ह हमारे गुरु भाई हैं। यह पहले पंजाब राज्य के मुकेरिया में रहते थे। मैं उनके पास चला गया। वहां कुछ समय तक रहा। मुझे बुलाने के लिये इनके पास चला गया। वहां कुछ समय तक रहा। मुझे बुलाने के लिये इनके पास गुरुजी की चिटठी आती थी तो यह उसे मुझसे छिपा लेते थे। मैं गुरुजी से मिले दिशा निर्देशों के चलते पैसे आदि से हाथ नहीं लगाता था। मेरे पास पूजा पाठ के सामान जो निमित्त मात्र था के अलावा कुछ नहीं था। वहां एक डेढ महीने रहने के बाद में वैश्नो देवी के दर्शन को चला गया। बिना पैसे के दिक्कत तो होती ही है पर ठाकुरजी सब दिक्कतों का समाधान कर देते थे। वहां मैं करीब दो ढाई महीने रहा। वहां मेरे पैर के अंगूठे में एक घाव हो गया। बहुतेरा इलाज कराया लेकिन उसका कोई लाभ नहीं हुआ। मुकेरिया से चलते समय मुझे गुरुजी के बुलाबे के पत्र आने और गुरुभाई दवारा मुझे इसके बारे में नहीं बताने री जानकारी हो चुकी थी । आखिर में गुरूजी की याद आयी और मैं दिल्ली आ गया । गुरूजी नें मुझे देखकर ङांट लगाई इतनें दिन कहां रहा ? और मैने बुलावा भेजा था तू क्यों नही आया ?मैने गुरूभाई व्दारा मुझसे चिट्ठी छुपानें की जानकारी देते हुए बताया कि वहां से मैं वैष्णों देवी चला गया था । इसके बाद गुरूजी ने पैर के अंगूठे के घाव का जिक् करते हुए कहा कि चल आ इस पर दवा लगा दूं । सच मानिये जिस घाव का मे इलाज करा कर थक गया था और जो ठीक होने का नाम नही ले रहा था गुरूजी के दवा लगाते ही एक घंटे में उसमें आराम हो गया । दूसरे दिन से तो पता ही नही चला कि मेरे कोई असहनीय पीङा देने वाला घाव भी था ।

प्रश्न- राम वाटिका में आने का संयोग कैसे बना? यहां गुरुजी के आदेश के चलते आये या फिर बगीची वाले हनुमानजी आपको खींच लाये ?
उत्तर- राम वाटिका में मुझे भेजने का फैसला तो गुरुजी पहले ही कर चुके थे। मुझे इसका आभास भी हो गया था। एकादि बार गुरूजी ने इस बारे में मुझसे चर्चा भी की पर मैं इस तरह के किसी बंधन में बंधन के लिये तैयार नहीं था। यही कारण था कि वैष्णों देवी से लौटने के बाद गर्मियों में मैं फिर हरिव्दार चला गया। वहां चार पांच महिने रहा। जंगल में जाकर साधना की। रोज चंडी देवी के दर्शन किया करता था। हमारे छोटे गुरूभाई श्याम सुंदर दासजी और पुरोहित चद्रभानजी एक दिन आये और मेरी रामायण आदि पुस्तक जिनका में नियमित पाठ किया करता था और छोटा मोटा सामान लपेट कर बोले कि चलो गुरूजी ने बलाया है। मैंने बहुत बहाने बनाये पर व्यर्थ साबित हुये। दिल्ली स्वीकार करने का दबाव डाला। पर में इसके लिये कतई तैयार नहीं हो रहा था। लेकिन इसके अगले दिन एक एसी घटना हुई कि में गुरूजी के आदेश को शिरोधार्य कर वर्ष 1966-67 में मंदिर श्रीराम-हनुमान वाटिका आ गया।

प्रश्न-ऐसी क्या घटना हुई जिससे किसी भी बंधन में न बधंने की हट करने वाला किशोर मन एक झटके में ही श्रीराम -हनुमानवाटिका मंदिर जाने को तैयार हो गया ?
उत्तर-
ऊपर जो प्रसंग चल रहा था यह उसके अगले दिन की घटना है । मैं गुरु स्थल के बगीचे में बैठा था । पास ही स्थित पेङ पर मुझे एक बंदर दिखाई दिया और मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि वह मुझे हाथ के इशारे से श्री हनुमान वाटिका चलने को कह रहा है । अनायास मेरे मन में ऐसा भाव आया कि मुझे बगीची वाले हनुमान जी स्वयं बुलाने आ गये है। यह क्षणिक वाकया है। इस वाकये से मैंने तत्काल अवगत कराया और वाटिका जाने के फैसले की भी जानकारी दी। तो गुरुजी ने कहा कि हम पहले से ही कह रहै हैं पर तू सुनता ही नही है। फिर वह बोले कि अच्छा ऐसा कर कि तीन महीने के लिए तू वाटिका चला जा अगर मन नहीं लगे तो वापस आ जाना । इस तरह तीन महींने के लिऐ मैं वहाँ आया और बगीचीवाले हनुमान जी की सेवा में ही लीन हो गया।

प्रश्न- अर्थात स्वयं बगीची वाले हनुमान जी आपको श्रीराम -हनुमान वाटिका मंदिर में लाये ?
उत्तर-
मुझे भी ऐसा ही लगता है कि स्वंय प्रभु की प्रेरणा से मैं यहाँ हूँ ।

प्रश्न- महाराज जी जब पहली बार आप यहाँ आये तब कैसी थी श्री हनुमान वाटिका- क्या वर्तमान जैसा ही स्वरुप था । या आपने इसमें बदलाव किया ।
उत्तर-
पहली बार मैं गुरुभाई दादा रतनदास महात्यागी जी के साथ पीछे के रास्ते से श्री राम -हनुमान वाटिका मंदिर आया था। तब वाटिका नाम जरुर था इसका। पर पूरी तरह खण्हहर थी। केवल हनुमान जी की मूर्ति सही सलामत थी। हालाकि हनुमानजी की मूर्ति के पीछे वाली दीवार तक गायब थी। चूकिं बगीची वाले हनुमानजी स्वयं प्रकट हैं। अत:उन्हे छोडकर शेष शिव परिवार देवीजी गणेशजी आदि की सभी मूर्तिया टूटी हुई थी। वाटिका का जो वर्तमान में मुख्य प्रवेश दार है। इसके बाहर स्मैकियों चरसियों और नशेडियों का जमघट रहता था। इसके अलावा दो गेट और थे पर उनका होना और न होना बराबर था। वाटिका की कोई चारदीवारी नहीं थी।

प्रश्न- .इसका अर्थ यह हुआ कि आपके आने से पूर्व वाटिका में कोई साधु या संत था ही नहीं ?
उत्तर-
मैने एसा कब कहा ? संतों की इस तपोभूमि में संतो का आगमन तो सदियों से है। पर साधु संतों की सेवा के लिए प्रसिध्द रहे इस मंदिर में पहले विरक्त भाव के साधु संत रहते थे । वह ग्रहस्थ लोगों से दूरी बनायें रखने के लिए नंग धङग भभूति आदि लगाए रहते थे। अत: संतों के क्रोध के डर से जन सामान्य की मंदिर से रोजमरा की जिंदगी में दूरी बनी रही। लेकिन समय के साथ यहां भी परिवर्तन हुआ।

प्रश्न- अर्थात् श्रीमान-हनुमान वाटिका का जो वर्तमान स्वरूप है उसके लिये आपको काफी मुसीबतों का सामना करना पडा ?
उत्तर-
देखिए निर्माण में वक्त तो लगता ही है। और वक्त लगने का मतलब परेशानियों से जूझकर मंजिल की ओर बढना ही निर्माण है। पर गुरूजी के रहते मुझे कभी किसी तरह की दिक्कत नहीं हुई। डर दहशत का तो दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं था.

प्रश्न- फिर भी निर्माण के दौरान की कुछ ऐसी स्मृतियां होती हैं जो स्मृति पटल पर चिरस्थायी होती हैं और जब नर्माण का जिक्र होता है। स्मृतियां मानस में उभर ही आती हैं
उत्तर-
यह सत्य स्वीकारने लायक है और जो सत्य स्वीकारने लायक है उसे कभी को स्वीकारना चाहिए। संतों को इससे अलग कैसे किया जा सकता है।




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