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‘मैं तो बाबा का ही सेवक हूं’ – महंत श्री योगेश पुरी महाराज

देश के संत समाज में अखाड़ा संस्कृति बहुत पुरानी है। अपवाद को यदि छोड़ दें तो देश भर में फैले मंदिर, मठों प्रमुख धर्मस्थलों का किसी न किसी अखाड़े से संबंध है। महानिर्माणी अखाड़ा तो धार्मिक क्षेत्र की अग्रिम पक्ति में शुमार है। उत्तर प्रदेश के आगरा शहर के ह्दयस्थल में स्थिल श्रीमन:कामेश्वर मंदिर भी निर्माणी अखाड़े से संबंद्ध है। इस मंदिर के युवा महंत श्री योगेश पुरी महाराज से मुक्तिधाम ने बात की। पेश है मुक्तिधाम से हुई उनकी बातचीत के कुछ अंश।

प्रश्न- महाराज जी इतनी बढ़ी गद्दी के महंत बनने का क्या कभी सपना देखा था ? वह भी युवावस्था में?

देखिये मैं यह तो नहीं कहूंगा कि मैने कभी इतनी बड़ी गद्दी का महंत बनने का सपना देखा था, पर यह अवश्य कहूंगा कि मैंने अपने पूज्य पिताजी जैसा बनने का सपना जरूर संजोया था । हर व्यक्ति के जीवन में किसी आदर्शपुरुष की छबि विद्यमान होती है। और वह अपने आदर्श पुरुष का अनुगामी बनने का सतत प्रयास करता है। मैं भी इसमें शामिल हूं। सौभाग्य से मेरे आदर्श मेरे पूज्य पिताजी थे। बचपन से ही उनके साथ रहा। घर का वातावरण प्रारंभ से ही धार्मिक था। जाहिर है कि उनके व्यक्तित्व का मेरे जीवन पर गहरा असर रहा जो मुझे इस मुकाम तक लाने में सहायक सिद्घ हुआ।

प्रश्न-आमतौर पर देखा गया है कि मंदिर, मठ के महंतों व पुजारियों के जो बच्चे ढंग से पढ़ लिख जाते हैं वह अपनी पुश्तैनी धरोहर से नौकरी या फिर व्यवसाय को ज्यादा वरीयता देते हैं। क्या आपके मन में भी कभी ऐसा भाव जाग्रत हुआ?
-जैसा कि मैने पूर्व में कहा कि बाल्यकाल से ही मेरे आदर्श मेरे पिताजी थे। लेकिन मैने पठन-पाठन को हमेशा वरीयता दी। पढऩे लिखने में भी अच्छा था। नौकरी का भाव जाग्रत तो हुआ पर राष्ट्र की सेवा वाली नौकरी का । इसके लिये एनडीए के कम्पटीशन में भी बैठा और श्रीमन:कामेश्वर बाबा की कृपा से मेरा सलेक्सन भी हो गया। ज्वाइनिंग के लिये लैटर भी आ गया,लेकिन अब मुझे ऐसा आभास होता है कि श्रीमन:कामेश्वर बाबा ने पूर्व में ही मुझे अपनी सेवा में रखने का फैसला कर लिया था। यही वजह रही कि देश सेवा की जगह बाबा की सेवा में लीन हो गया।

प्रश्न- इसे आपका धर्म की तरफ झुकाव भी तो माना जा सकता है?
-मैं यह तो नहीं कह सकता कि मेरा धर्म की तरफ झुकाव था। हां यह कह सकते हैं कि धर्म को जानने की मेरी अद्भुत जिज्ञासा थी। मैं यह जानाना चाहता था कि धर्म आखिर है क्या? क्या हम जो कर रहे हैं वही धर्म है या कुछ और है। क्या संसार में रहना धर्म है या सांसारिकता से विमुख होना धर्म है? बस इन्ही जिज्ञासाओं ने मुझे धर्म के मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित किया। हां यह माना जा सकता है कि घर के धार्मिक वातावरण और पिताजी जैसा बनने की ललक इसमें मददगार साबित हुई।

प्रश्न- महाराज जी, समाज के एक वर्ग का मानना है कि वर्तमान में धर्म का व्यवसायीकरण शुरू हो गया है। धर्म धनोपार्जन का एक बड़ा माध्यम बनता जा रहा है। भौतिक सुखों को प्राप्त करने का सबसे सरल माध्यम धर्म का बाना ओढ़कर धर्माचार्यों की जमात में शामिल हो जाना है। आपका इसके बारे में क्या नजरिया है?
-देखिये, यदि सही मायनों में देखा जाये तो व्यवसायीकरण किसका नहीं हो रहा। जब सभी मान्यताओं व वर्जनाओं का व्यवसायीकरण हो रहा है तब धर्म को इससे अलग कैसे किया जा सकता है?यह सच स्वीकार करने योग्य है कि धर्म का किसी न किसी रूप में व्यवसायीकरण हो रहा है। यह नव उपभोक्तावाद का असर है। इसका अर्थ यह नहीं कि समूचे धर्म क्षेत्र का व्यवसायीकरण हो गया है। व्यापकता की दृृष्टि से देखें तो ऐसी प्रवृत्ति के लोगों की संख्या बेहद सीमित है। धर्म की व्यापकता में ऋषि मुनि तपस्वी संतों के त्याग और समर्पण का महती योगदान है। फिर इन धर्माचार्यों द्वारा भी अलख तो धर्म की ही जलाई जा रही है।

प्रश्न-आपको नहीं लगता कि धर्म क्षेत्र में आडंबरियों की संख्या दिनों दिन बढ़ रही है? हालत यह है कि आज आडंबरियों और सच्चे संतों में भेद मुश्किल होता जा रहा है?
-हम सदि श्रीमदभागवत का अध्यन करें तों इसमें श्री शुकदेव जी ने कलयुग में धर्म की स्थिति का वर्णन करते हुए स्पष्ट कहा है कि पाखण्डम् प्रचुरे धर्म अर्थात कलयुग में धर्म में पाखण्ड प्रचुर हो जायेगाा अत: यह युग का प्रभाव है। यह तो होना ही है। यह भी सही है कि धर्म और पाखंड में कोई खास भेद नहीं रह गया है। लेकिन ध्यान रखें कि संत कहता है कि मुझसे जितना ले सकते हो,ग्रहण कर सकते हो लो,ग्रहण करो,वही पाखण्डी कहता है कि तू जितना मुझे लाकर दे सकता है लाकर दे। पाखण्ड के सामने मन विक्षिप्त होगा,लेकिन धर्म अर्थात संत के समक्ष आपको शांति मिलेगी। पाखंड भी खींचता है और धर्म भी खींचता है। पाखंडी भी त्रिपुण्ड लगाता है और धर्माचार्य भी त्रिपुण्ड लगाता है। पाखण्ड जादूगरी दिखाता है और धर्म चमत्कार। लेकिन पाखण्ड का आकर्षण दिन-ब-दिन घटता है और धर्म के प्रति विश्वास बढ़ता है। धर्म और पाखण्ड में बस यही अंतर है।

प्रश्न- संतों में लग्जरी कार,मोबाइल और फेशनेवुल गेरुए वस्त्रों का मोह बढ़ गया है। धार्मिक दृष्टिï से देखा जाए तो क्या यह उचित है?
-इसमें अधर्म वाली कौन सी बात हो गई। इसके लिये मैं फिर श्रीमद भागवत का जिक्र करना चाहूंगा। जिसमें यह बताया गया है कि जब कश्यप ऋषि और अद्विताय का विवाह हुआ तो उन्होंने ऐसे सुंदर नगर का निर्माण किया जिसमें भिन्न-भिन्न प्रकार के ऐसे सुखों और भोगों का समावेश किया गया था जो उस समय स्वर्ग में भी उपलब्ध नहीं थे । यही नहीं उन्होंने एक दो नहीं पूरे दस हजार वर्षों तक उन सुखों का भोग किया। अत: संतों के भोगों सुख सुविधाओं को कैसे धर्म के विरूद्घ माना जा सकता है? लेकिन मैं यह जरूर कहूंगा कि भोग के साथ योग की भी आवश्यकता है। अत:इनसुविधाओंकाउपयोगहोनाचाहिये।

प्रश्न- महंत जी क्या भगवान को प्राप्त करने के लिये वैराग्य जरुरी है? गृहस्थ जीवन में रहकर क्या भगवान की प्राप्ति के लिये साधना नहीं की जा सकती?
-कौन कहता है कि भगवान की प्राप्ति के लिये वैराग्य आवश्यक है?मैं इस बात का एकदम विरोध करता हूँ जो ऐसा कहता है वह एकदम गलत है। क्या गृहस्थ जीवन गुजारने वाले हमारे ऋषि मुनियों को भगवान नहीं मिले? क्या विश्वामित्र को भगवान नहीं मिले या गुरु वशिष्ठ को भगवान नहीं मिले। कौन कहता है कि वेदव्यास जी को भगवान नहीं मिले? अरे राजा दशरथ के घर तो भगवान राम स्वयं प्रकट हुए। नंद के यहां स्वयं आनंदकंद भगवान कृष्ण के रूप में प्रकट हुए। वैराग्य जीवन इस बात का द्योतक है कि हमारे जीवन में वैराग्य होना चाहिये,लेकिन संसार को छोड़कर वैराग्य का कोई मतलब नहीं यह संसार भी तो उसी का बनाया हुआ है। हां संसार में रहें पर उसे धारण न करें जैसे कीचड़ में कमल खिलता है,लेकिनवहकीचड़कोधारणनहींकरताठीकउसीप्रकारहमेंगृहस्थजीवनअवश्यगुजारनाचाहिये।बिनागृहस्थजीवनकेहमेंभगवानकीकभीप्रप्तिनहींहोसकती।

प्रश्न- साधना का सहज और सरल उपाय क्या है?
-साधना का सहज और सरल उपाय उस परमपिता के सामने समर्पण है। समर्पण से उत्तम और कोई दूसरा मार्ग है ही नहीं।

प्रश्न- पूजा क्या है? इससे हमें क्या प्राप्त होता है?
-देखिये धर्म के प्रति मेरा अलग नजरिया है। मैं धर्म को विज्ञान के रूप में देखता हूँ।अत: में यह नहीं कहूँगा कि पूजा से परलोक सुधरता है। मैं वर्तमान को वरीयता देता हूँ। अत: मेरी अपनी दृष्टिï में पूजा वह साधन है जिससे हमें आत्म बल मिलता है।

प्रश्न- धर्म और राजनीति के बारे में आपकी क्या धारणा है? क्या धर्म और राजनीति का घालमेल समाज के लिये हितकर है?
-देखिये धर्म और राजनीति परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं। धर्म और राजनीति का सदैव सामजस्य रहा है। धर्म हमेशा राजनीति धर्म हमेशा राजनीति का मार्गदर्शक रहा है।। राजनीति को हमेशा धर्म ने पल्लवित किया है। राजा दशरथ और गुरू वशिष्ठ राजनीति और धर्म के सामजस्य के ज्वलंत प्रमाण हैं,लेकिन राजनीति जब-जब भटकी उसे सदैव धर्म का ही आसरा मिला। राजनीति ने जब-जब धर्म की शरणागत होकर याचना की कि मेरे पास सब कुछ वैभव होकर इसे कोई भोगने वाला नहीं तब-तब धर्म ने उसे राह दिखाई। अत: धर्म और राजनीति को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। वर्तमान संदर्भो की बात करें तो भारत को स्वतंत्रता भी धर्म के राह दिखाने से ही मिली। हमारे राष्टï् पिता महात्मा गांधी ने धर्मरूपी सत्य का सहारा लेकर भारत को स्वतंत्र कराने में अहम् भूमिका अदा की। धर्म और राजनीति को अलग करके देखना सही नहीं हैं। हां अति सर्वत्र वर्जना अति नहीं होनी चाहिये।

प्रश्न- तब तो आप धर्माचार्यों के राजनीति में आने के फैसले को भी सही कहेंगे?
-यकीनन धर्माचायों के राजनीतिक जीवन में प्रवेश को में उचित मानता हूँ,लेकिन योग्य धर्माचार्यों के सक्रिय राजनीति में प्रवेश का हम समर्थन करते हें। हमारा यह मानना है कि राजनीति यदि धर्म का सहारा नहीं लेगी तो फलीभूत नहीं होगी। वर्तमान राजनीति में जो भ्रष्टाचार, दुराचार का बोलबाला हो रहा है उसमें कहीं न कहीं धर्म का नैतिकता का हनन हो रहा है। अत: यदि हमें राजनीति से भ्रष्टाचार और दुराचार रूपी गंदगी को दूर करना है तो धर्म का आसरा लेना होगा। योग्य धर्माचार्यों की मदद लेनी होगी। वैसे ही जैसे घर की गंदगी को साफ करने के लिये किसी बाहरी व्यक्ति के इंतजार की जगह खुद हाथ में झाड़ू लेकर सफाई करने से ही लाभ होता है,ठीक वैसे ही राजनीति जब भटकाव के दौर में हो तो उसे योग्य धर्माचार्यों की शरण लेना ही हितकर है।

प्रश्न- महंतजी आप युवा हैं देश के युवाओं की समस्या को अच्छी तरह समझते हैं। देश की तरुणाई वर्तमान में भटकाव के दौर में फिर धर्माचार्य उन्हे सही राह क्यों नहीं दिखाते?
-मैने पूर्व में भी आपसे कहा कि कहीं न कहीं मूल रूप से धर्म में भी भटकाव की स्थिति है। इसका अभिप्राय यह नहीं कि धर्म भटक रहा है अपितु धर्म को जानने वाले कहीं न कहीं भटक रहे हैँ। निश्चित तौर पर वह युवाओं का मार्ग दर्शन कर सकते हैं उन्हें ऐसा करना भी चाहिये,मगर वह ऐसा कर नहीं रहे है। क्यों नहीं कर कर रहे यह निश्चय ही सोचनीय प्रश्र है। देश के धर्माचार्यों को इस पर चिंतन करना चाहिये। जहां तक युवाओं का प्रश्र है इतिहास साक्षी है क्रांति के जनक हमेशा नौजवान ही रहे हैं। चाहे वह राजा राम रहे हो या कृष्ण रहे हों विवेकानंद हो या फिर स्वामी दयानंद हों।

प्रश्न- भारतीय संस्कृति पर लगातार पाश्चात देशों का हमला हो रहा है। इसकी वजह क्या है और इससे बचाव के लिये क्या होना चाहिये?
-देखिये वर्तमान में भारतीय संस्कृति पर पाश्चात देशों का जो हमला हो रहा है वह कहीं बाहर से नहीं हो रहा है,बल्कि हमलावर हमारे अपने ही हैं। मैं तो बल्कि यह कहूंगा कि अपनी संस्कृति पर हमला हम स्वयं कर रहे हैं। आज हम अंग्रेजी भाषा को प्रधानता दे रहे है। ठीक है भाषा का ज्ञान जरूरी है होना चाहिये,मगर उसे ओढऩे, बिछाने या पहनने की क्या जरूरत है। इसके लिये हमें स्वयं अपने घर से पहल करनी होगी। हमें अपने घरों से गुड मार्निंग,गुड इवनिंग और गुड नाइट को विदा कर राधे-राधे,जय कृष्णा या जय श्रीराम की आदत डालनी होगी। इस दिशा में बहुत काम हो रहा है हमारे संत अलख जगाने में लगे हैं। फिर भी हमें अपनी संस्कृति की रक्षा के लिये खुद आगे आना होगा तभी हम इन हमलों से खुद को बचा सकते हैं।

प्रश्न- महंतजी आपको नहीं लगता कि हमारे संतों को एक-एक कर निशाना बनाया जा रहा है। पहले काच्चिकामकोटि के शंकराचार्य और अब देश की धरोहर योग का दुनिया में डंका बजाने वाले बाबा रामदेव को विवादों में घसीटना। कहीं यह सुनियोजित साजिश का हिस्सा तो नहीं?
-बिल्कुल यह सुनियोजित षडयंत्र है। काच्चिकामकोटि के महाराजश्री शंकराचार्य जी की बात करें तों क्या कर रहे थे बेचारे महाराजश्री। यह ठीक है कि उनकी आज पाँच हजार करोड़ की सम्पत्ति है। लेकिन उस सम्पत्ति में कोई पेट्रेाल पम्प नहीं हैं। कोई शराब का कारखाना या होटल नहीं हैं। उस सम्पत्ति से हजारों निर्धन बच्चों को शिक्षा दी जा रही है। उन्हें निशुल्क भोजन, चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। लेकिन जो करोड़ों अरबों रुपयों के घोटाले बाज हैं, जिनके नाम पर पेट्रेाल पम्प हैं वह वोट बैंक के लिये महाराजश्री को घृणित आरोंप लगाकर परेशान कर रहे हैं। इसी तरह बाबा रामदेव को निशाना बनाया जा रहा है जो व्यक्ति प्रेम व सोहाद्र का अलख जगारहा है। जो काम बड़े -बड़े राजनीतिज्ञ नहीं कर पाये। यहाँ तक कि जो काम राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी नहीं कर पाये। वह काम बाबा रामदेव कर रहे हैं। हिंदू हो या मुसलमान सिख या इसाई सब एक साथ उनके कैम्प में बैठकर योग कर रहे हैं। वह योग जिसे हमारे सनातन धर्म में देवता की उपमा दी गई है। जो व्यक्ति योग को बढ़ावा दे रहा है। स्वदेशी को बढ़ावा दे रहा है। इससे बड़ा एकता का कोई दूसरा उदाहरण नहीं हो सकता लेकिन दुखद पहलू यह है कि केवल निजी स्वार्थ और वोट बैंक की खातिर ऐसे व्यक्ति को मिथ्या आरोपों के जरिये परेशान किया जा रहा है। मैं तो भगवान से प्रार्थना करता हूं कि ईश्वर ऐसे भटके हुए राजनेताओं को सदबुद्घि दे। बाबा रामदेव की दवाइयों में मिलावट की बात कही जा रही है इनसे कोई यह क्यों नहीं पूठता कि अंगे्रजी दवाइयों में जो शाटस मिलाये जाते है वह क्या है। कीटाणुओं और जीवाणुओं को मार कर दवाऐं बनाइ जा रहीं हैं उनकी कोई जांच क्यों नहीं करता। फिर मरने के बाद मानव शरीर क्या है मिटटी है। यदि यह मिटटी किसी की जान बचा रही है तो उसमें बुराई क्या है?

प्रश्न- आपकी नजऱ में राष्ट्र का शासक कैसा होना चाहिये?
-धर्म की दृष्टि देखें तो शासक राजा राम की तरह न्यायप्रिय ,सत्य व त्याग के मार्ग का अनुसरण करने वाला होना चाहिये। राजा राम ने सत्य का अनुसरण करते हुए सदैव न्याय का साथ दिया। और जब बात कुल की मर्यादाओं की रक्षा की आयी तो अपनी सीता जैसी पतिव्रता स्त्री को त्यागने में भी गुरेज नहीं किया। अत: राष्ट्र का शासक राजा राम का अनुगामी होना चाहिये।




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