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व्यापार नहीं है धर्म- महंत श्री श्री नरेंद्र गिरी जी महाराज

व्यापार नहीं है धर्म – अधर्मियों एवं ढोंगियों की संख्या बढ़ी।

 gopi_guru_muktidham बाघम्बरी पीठ के वर्तमान पीठाधीश्वर एवं तीर्थराज प्रयाग के लेटे हुए हनुमान मंदिर के महंत श्री श्री नरेंद्र गिरि जी महाराज उन धर्माचार्यों में शुमार हैं जो कि कलयुग में धर्म की पताका को न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में फहराने में पूरे प्राण-प्रण से जुटे हैं। मुक्तिधाम के सहायक संपादक हरिशरण उपाध्याय(गोपी गुरु) की उनसे धर्म के मौजूदा स्वरूप एवं समसामायिक मुद्दों पर विस्तृत बातचीत हुई। प्रस्तुत है इस बातचीत का ब्योरा।
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सवाल-महाराज जी जिस अवस्‍था में प्राय: युवाओं में अपना कॅरियर बनाने की चाह होती है। हर कोई डाक्‍टर,इंजीनियर, अफसर  या व्‍यवसायी बनना चाहता है। आपके मन में सन्‍यासी बनने का विचार कैसे आया। कही इसके पीछे घर का धार्मिक वातावरण तो नहीं रहा । या फिर कोई ऐसी घटना हुई जिसने मन को बैरागी बना दिया।

जवाब- देखिए सन्‍यासी यूं ही कोई नहीं बनता और न ही कोई ऐसे ही घर छोडता है। इसके पीछे मूलत: तीन कारण होते है। पहला मन भक्तिभाव जाग्रत होना। दूसरा-पारिवारिक कलह और तीसरा जीवन से वितष्‍णा।

सवाल आपके बैरागी बनने के पीछे इनमें से कौन सा कारण  बना।
जवाब-जहां तक हमारा संबंध है। कहने में कोई संकोच नहीं कि इसके पीछे मूल कारक पारिवारिक कलह थी। गांव में ही एक संत जी की कुटिया थी। हम भी वहां जाते थे। बाल मन पर संत जी के उपदेशों का गहरा असर हुआ। इससे भक्ति भावना जाग्रत हुई। घर वालों को यह अच्‍छा नहीं लगता था। इसी मध्‍य घर में कलह हो गई। इससे मन सांसारिक भोग से उचट गया और सन्‍यासी बनने का फैसला कर घर परिवार सब छोड दिया।

सवाल-मतलब आपके सन्‍यासी बनने की मूल वजह घरेलू कलह रही।
जवाब-सच यही है। भक्तिमार्ग का अनुगामी बनने में घर की कलह कारक बनी। हम आज जिस गद़दी का प्रतिनिधित्‍व कर रहे हैं या कहिए जिस ओहदे पर बैठे हैं। हम इस सत्‍य को छुपा भी सकते थे, लेकिन हमने ऐसा नहीं किया, क्‍योंकि जब हमने सन्‍यासी का बाना धारण कर लिया। सन्‍यासी हो गए तो सत्‍य बोलना हमारा धर्म है।

सवाल-क्या अवस्था रही होगी उस समय।
जवाब- यही कोई 14-15 वर्ष की हां हमने हाईस्‍कूल पास कर लिया था।

सवाल-घर छोडने के बाद आप सीधे गांव में संत जी की कुटिया में गए या कहीं और।
जवाब-पहले बाबा की कुटिया में गए। उन्‍हें फैसले की जानकारी दी। बाबा बोले बेटा सन्‍यास की दीक्षा देने की परम्‍परा अखाडों में होती है। सही मायनों में सन्‍यासी अखाडों से ही बनते हैं। अत: सन्‍यासी बनने के लिए तुम्‍हें वहीं जाना होगा

सवाल-फिर आपने किस अखाडे की ओर रुख किया और वहां से कैसे दीक्षा मिली।
जवाब-इसके बाद बाबा के बताए रास्‍ते का अनुशरण करते हुए हम निरंजनी अखाडा पहुंचे। वहां महाराज जी से मिले और सन्‍यासी बनने की इच्‍छा जाहिर की।

सवाल-फिर आपने किस अखाडे की ओर रुख किया और वहां से कैसे दीक्षा मिली।
जवाब-इसके बाद बाबा के बताए रास्‍ते का अनुशरण करते हुए हम निरंजनी अखाडा पहुंचे। वहां महाराज जी से मिले और सन्‍यासी बनने की इच्‍छा जाहिर की।

सवाल-फिर क्‍या हुआ?
जवाब –दीक्षा मिलते ही गुरु सेवा में लग गए। अखाडों में विभिन्‍न तरह की सेवाएं होती है। जैसे गऊ सेवा,भंडारण सेवा,संत सेवा , गुरु सेवा आदि। यह सभी सेवा तप की श्रेणी में आती हैं। संत का स्‍वयं पाकी होना बेहद जरूरी है। इसके लिए भंडारण सेवा अहमं है। उदाहरण के लिए मान लीजिए हम भंडारण सेवा में हैं तो हम जो भोग बना रहे हैं। इसका भगवान को भोग लगेगा। संत भी ग्रहण करेंगे। अत: भोग बनाते समय समर्पण का भाव जरूरी है। तभी वह परिपूर्ण होगा। यह जो समर्पण है यही तो तप है। तप का मतलब एक टांग पर क्षडे होकर मंत्रों का जाप करना ही नहीं है। वह भी तप है लेकिन गुरु आश्रम में सेवा भी उससे कमतर नहीं है।

सवाल-आपने कौन सी सेवा का वरण किया।
जवाब – आखाडों में रहने वाले सन्‍यासियों को गुरु निेर्दश पर सभी सेवा करनी पडती है। इसके पीछे का असल भाव गुरु द्वारा अपने शिष्‍य से घमंड नामक जंतु को अलग कराना है। क्‍योंकि सन्‍यास की पहली सीडी अहमं का त्‍याग है। ये जो अहमं है न जिसे गरूर कहते हैं ये मनुष्‍य को यूं ही नहीं छोडता। अत: गुरु सबसे पहले इसी का त्‍याग कराते हैं। अहमं दूर होने का मतलब ही सन्‍यासी होना है। अत: गुरुदेव ने हमारे भी अहमं का त्‍याग कराने के लिए हमसे सभी सेवा कराईं। अखाडों में गुरु के निर्देश पर पूजा पाठ के नियम उप नियमों को भी रटाया जाता है। हमारा भी पठन पाठी उसी पद्धति से हुआ।

सवाल-निरंजनी अखाडा से बाघम्‍बरी पीठ में कैसे आना हुआ
जवाब-गुरु किरपा से। आप अखाडों में दीक्षा लेने के बाद किसी भी संत की सेवा में रह सकते हैं। बाघम्‍वरी पीठ के हमारे गुरुदेव भगवान गिरि जी महाराज भी निरंजनी अखाडा के ही सन्‍यासी थे। सेवा के दौरान ही हम उनके संपर्क में आए। बाद में वह बाघम्‍वरी पीठ के पीठाधीश्‍वर बल्‍देव महाराज के सेवा में चले गए। उनके पीछे हम भी बाघम्‍वरी पीठ में गुरु सेवा में यहां चले आए।

सवाल- क्‍या बाघम्‍वरी पीठ निरंजनी अखाडा से संबंधित है।
जवाब-नहीं पीठ का निरंजनी अखाडा से व्‍यवहारिक संबंध है, बाघम्‍वरी पीठ स्‍वतंत्र है।

सवाल – आप बाधम्‍वरी पीठ के पीठाधीश्‍वर कब और कैसे बने।
जवाब-देखिए, गुरु शिष्‍य परम्‍परा में आपसी विश्‍वास और प्रेम का संबंध होता है। गुरु जब शारीरिक रुप से कमजोर हो जाते हैं या कहिए कि वह अपनी गद़दी का किसी को वारिस बनाना चाहते हैं तो उस समय वह यह देखते हैं कि हमारा कौन सा ऐसा शिष्‍य है जो गुरुकुल की परम्‍पराओं को आगे बढाने और उसके विकास में सार्थक भूमिका अदा कर सकता है। गुरू का जिय शिष्‍य पर विश्‍वास हो जाता है । वह उसी को अपना उत्‍तराधिकारी बना देते हें। इसकी बकायदा वसीयत होती है। हमें गुरु महाराज भगवान गिरि से वर्ष 2004 में यह गद़दी प्राप्‍त हुई।उन्‍होंनहमें यहां का पीठाधीश्‍वर बनाया|

सवाल- त्रिवेणी में लेटे हुए बडे हनुमान जी का मंदिर का प्रबंधन बाघ्‍म्‍वरी पीठ के पास ही है।
जवाब – हां बडे हनुमान जी का मंदिर बाघम्‍वरी पीठ से संबंद्ध है। मंदिर की पूरी व्‍यवस्‍था पीठ की देखरेख में ही है।

सवाल- त्रिवेणी में लेटे हुए बडे हनुमान जी का मंदिर का प्रबंधन बाघ्‍म्‍वरी पीठ के पास ही है।
जवाब – हां बडे हनुमान जी का मंदिर बाघम्‍वरी पीठ से संबंद्ध है। मंदिर की पूरी व्‍यवस्‍था पीठ की देखरेख में ही है।

जब धर्म और सदाचार की राह दिखाने वाले ही अधर्मी होंगे तो अधर्म तो बढेगा ही। नकली साधु-संतों के कारण सच्‍चे संत-महात्‍माओं को भी दिक्‍कत हो गई है। टीवी पत्र-पत्रिकाओं में श्री-श्री 108,1008 टौर जाने क्‍या क्‍या पदवी धारी महात्‍माओं की बाढ सी आ गई है। अब तो कथावाचक भी संत हो गए है। इनका हाल ये है कि श्रीमद भागवत सप्‍ताह के दो श्‍लोकों का उल्‍लेख करने के बाद आपको किस्‍से कहानियां सुनाने लग जाते हैं। आपको नचाएंगे, गवाएंगे पर वास्‍तविक भागवत का श्रवण नहीं कराएगें। अब ऐसे में अधर्म नहीं बढेगा तो क्‍या होगा।

सवाल- ऐसी मान्‍यता है कि कलयुग में हनुमान जी शरीर मौजूद हैं। भक्‍तों को रामकथा सुना रहे हैं। जहां राम कथा होती है वह सशरीर मौजूद रहते हैं।
जवाब- मानना क्‍या यह तो प्रमाणिक है। कलयुग ही क्‍यों हनुमान जी तो चारों युगों में मौजूद रहते हैं।

सवाल- महाराज वर्तमान में जितना धर्मबढ रहा है उससे ज्‍यादा अधर्म बढता जा रहा है। जिस हिसाब से रामकथा और श्रीमद भागवत सप्‍ताह समेत धार्मिक आयोजन हो रहे हैं। उसके बावजूद वर्तमान में झूठ फरेब,पापाचार,अत्‍याचार अनाचार का बोलबाला सा हो गया है।
जवाब – आप ठीक कह रहे हैं। तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में इसका उल्‍लेख किया है। जाके सिर पर जटा विशाला। ते तापर प्रशिद्ध कलिकाला।। कहने का अभिप्राय यह है कि वर्तमान में ढोंगी साधु,महात्‍माओं एवं अधर्मियों की संख्‍या बढ गई है। जब धर्म और सदाचार की राह दिखाने वाले ही अधर्मी होंगे तो अधर्म तो बढेगा ही। नकली साधु-संतों के कारण सच्‍चे संत-महात्‍माओं को भी दिक्‍कत हो गई है। टीवी पत्र-पत्रिकाओं में श्री-श्री 108,1008 टौर जाने क्‍या क्‍या पदवी धारी महात्‍माओं की बाढ सी आ गई है। अब तो कथावाचक भी संत हो गए है। इनका हाल ये है कि श्रीमद भागवत सप्‍ताह के दो श्‍लोकों का उल्‍लेख करने के बाद आपको किस्‍से कहानियां सुनाने लग जाते हैं। आपको नचाएंगे, गवाएंगे पर वास्‍तविक भागवत का श्रवण नहीं कराएगें। अब ऐसे में अधर्म नहीं बढेगा तो क्‍या होगा।

सवाल- लेकिन एक सामान्‍य आदमी कैसे पहचाने कि कौन संत है और कौन ढोंगी है। ढोंगी का पूरा बाना तो संत जैसा ही होता है।
जवाब – उचित सवाल है। देखिए पहली नजर में तो स्‍वयं हनुमानजी भी कालनेमि राक्षस के झांसे में आ गए थे और उसे पहचान नहीं सके, लेकिन जैसे ही उन्‍हें असलियत पता चली उन्‍होंने उसे दंड दिया। ऐसे में सामान्‍य आदमी के ढोंगियों के चक्रव्‍यूह में  फंसने की पूरी संभावना रहती है। बल्कि ऐसा हो रहा है, लेकिन सच्‍चे साधु और ढोंगी का भेद ज्‍यादा दिन नहीं छुपता। इसकी पहचान सिर्फ अंतरआत्‍मा से ही संभव है। जैसे रास्‍ते में आपको कोई पर्स पडा मिल जाए तो आपका मन उसे उठाने को करता है, लेकिन तत्‍क्षण अंतरआत्‍मा ऐसा करने से रोकती है,लेकिन मोह हावी होते ही आप पर्स उठा लेते हैं। ठीक ऐसे ही ढोंगी साधु को पहली नजर में अंतरआत्‍मा पहचान कर उससे दूर रहने की सलाह देती है। लेकिन वह आपको तमाम तंत्र-मंत्रझोड फूंक के जरिए चंद दिनों में पूंजीपति बनाने के जब सपने दिखाता है तो आप उसकी वाकपटुता के चुगुल में फंस जाते हैं। संत ऐसा नहीं करते संतों के तो दर्शन मात्र से ही उद्धार होता है।

सवाल- वर्तमान में धर्म को व्‍यवसाय बना दिया है। आज के संत कहते हैं मोह माया को छोडो, लेकिन वही सबसे ज्‍यादा माया के पुजारी हो गए हैं। धर्म के नाम पर दोनों हाथों से धन बटोरने में लगे हैं। इससे सदाचारी लोगों की आस्‍था को ठेस नहीं लगती।
जवाब- ये निश्‍चय ही गलत है हम इसका विरोध करते हैं पर ऐसा हो रहा है। यह सही है। आपको अपनी ही घटना बताता हूं। एक बार दक्षिण प्रांत से चार लोग आए बोले महाराज हम बडे हनुमान जी का लॉकेट बनाएंगे। उसमें हनुमान जी का फोटो होगा। प्रति लॉकेट आपको 1500 रुपये देंगे। इसमें आपको कोई लागत नहीं देनी होगी। बस हमारे साथ एक करार करना होगा। आपको टी चैनल पर संदेश देना होगा कि यह लॉकेट लाखों मंत्रों का जाप कर बडे हनुमान जी को सिद्ध कर बनाया गया है। इसके धारण करते ही कष्‍ट दूर हो जाते हैं। जबकि वास्‍तविकता यह है कि हमने ऐसे किसी लॉकेट को मंत्रों से सिद्ध नहीं किया था। हमने उनकी बात मानने से इंकार कर दिया। हम जानते थे कि हमारे एक संदेश से ये लोग हनुमान जी की लाखों भक्‍तों को ठगेंगे। ऐसे ही लोगों ने धर्म को व्‍यवसाय बना दिया है जिससे अधर्म बढ रहा है। हमें इनसे सावधान रहना होगा।

सवाल- आजकल साधुओं के पद भी खैरात में बोटे जा रहे हैं। अखाडों ने साधुओं की पदवियों की रेट लिस्‍ट बना दी है । जितना बडा भंडारा करोगे उतनी बडी पदवी मिलेगी। हाल में कथित राधे मां को महामंडलेश्‍वर घोषित कर दिया गया। बबाल होने पर जांच बैठा दी। इसके बारे में आप क्‍या कहेंगे।
जवाब-ये गलत है राधे मां फ्राड है। कुछ त्रुटियां अखाडों में भी आ गई हैं। ये पद ऐसे बांटने का हम विरोध करते हैं। यह गंभीर मामला है। अखाडा प्रमुखों को इस पर गंभीरता से चिंतन करना चाहिए।

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साधु संतों को पदवी देने का सवाल है अखाडों में इसके नियम है यह देने का आधार केवन विद्वता है। निरंजनी अखाडा इस मामले में
काफी गंभीर है। उस पर अंगुली नही उठाई जा सकती।

सवाल- आजकल अखाडों में भी राजनीति ने पैर पसार लिए हैं। अखाडें भी दो भागों में बंट गए हैं।

जवाब-नहीं ऐसा कुछ नहीं हैं । आपस में कुछ गलतफहमियां हो गई थी जो अब दूर हो गईं हैं। दशहरा बाद आपको सब ठीक दिखाई देगा। हनुमानजी के भक्‍तों को संदेश देना चाहेंगे।  हनुमान जी के पथ के अनुगामी

बनने के लिए अहमं का त्‍याग कर सेवक और स्‍वामी भक्ति को अंगीगार करें। सेवा भाव जिनके अंदर है सच मायने में वहीं हनुमानजी के भक्‍त कहलाने के अधिकारी हैं।




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