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सम्बधियों की सेवा से संवारे अपना भविष्य

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मुक्तिधाम के पाठकों को बता रही कविता चैतन्य कि कैसे सम्बधियों की सेवा से संवारे अपना भविष्य

सम्बधियों की सेवा से संवारे अपना भविष्य

ज्योतिष शास्त्र अति प्राचीनकाल से जाना जाता है। हर वह ञान है जो ग्रहों की स्थति, उनके भ्रमण काल एवं उनका हम सब पर पङने वाले प्रभाव को बताता है। जिस प्रकार मनुष्य आदि सभी प्राणियों में नेत्र प्रधान होते हैं, उसी प्रकार ज्योतिष शास्त्र समस्त वेदों में प्रधान है। ज्योतिष शास्त्र पूर्ण रुप से वैञानिक पधति पर आधारित है। kundli one सिदांत संहिता सहित इसके तीन स्तम्भ है। प्राय शंका की जाती है कि विधाता ने जो लिख दिया है, उसे भोगना ही पङेगा, तो जानने से क्या लाभ। वास्तव में मनुष्य भाग्य का गुलाम नहीं है, वह स्वंय अपने भाग्य का निर्माता है। वास्तव में यह शास्त्र हमें भाग्यवादी नहीं बनाता है। यह शास्त्र तो हमारे पूर्व जन्मों के पाप व पुण्य को प्रकट

तो हमारे पूर्व जन्मों के पाप व पुण्य को प्रकट कर स्पष्ट करता है कि जीवन कौन-कौन से दुख सहने पङ सकते हैं तथा उनसे बचने या उन्हैं कम करने ते लिए क्या-क्या उपाय हैं। हम जानते हैं कि छाता के बिना वर्षा में हम भीग जायेंगे, जाङे में ऊनी कपङे के बिना सर्दी लग सकती है। बीमारी होने पर ङाक्टर के पास जाना ही पङेगा, यह सब उपाय ही तो हैं कष्टों से बचने के लिए।

जब किसी जात का जन्म होता है तो क्षितिज पर जो राशि उदित हो रही होती है, उसी को लग्न मानकर कुङली तैयार की जाती है। तथा उसमें गोचर अनुसार ग्रहों को व्यवस्थित किया जाता है। जातक का किसी परिवार विशेष में जन्म लेना, उसके पूर्व जन्मों के कर्मो व प्रारब्ध के अनुसार निर्धारित रहता है। तथा उसका भाग्य उस परिवार के प्रत्येक सदस्य के साथ किसी न किसी रूप में जुङा रहता है। जातक के जन्म के साथ ही अनेक रिश्तों का जन्म होता है। जैसे, माता, पिता, भाई, बहन, चाचा, मामा इत्यादि।

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कुंङली में बारह भाव होते है, प्रत्येक भाव का अपना- अपना अलग कार्य क्षेत्र है। जिसमे मनुष्य के जीवन के सभी कार्यो का ञान होता है। प्रत्येक भाव किसी न किसी संबध को दर्शाता है। जैसे प्रथम भाव से जातक का स्वंय का स्वरुप, आरम्भिक जीवन, स्वास्थ्य, व्यक्तित्व का धोतक है। दितीय भाव से परिवार धन, तृतीय भाव छोटे भाई- बहन, चचेरे भाई- बहन,देवरानी से संबधित है। चतृर्थ भाव से पारिवारिक जीवन, माँ पंचम भाव से बच्चे, दादा छठे भाव से मामा, सद्दाम भाव से पति-पत्नी, कारोबार में भागीदारी आदि देखा जाता है। अष्टम भाव से ससुराल पक्ष , नवम भाव गुरू, पिता, पोते, पोती , छोटे भाई की पत्नी का धोतक है। तथा दशम भाव से भी पिता का संबध है। एकादश भाव बङे भाई -बहन, बुआ, चाचा तथा दादश भाव दैवीय ञान का धोतक है।

इन बारह भावों में बारह राशियाँ -मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन तथा नौ ग्रह सर्य, चद्रँमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि यह केतु व्यवस्थति रहते हैं। इन नव ग्रहौं के भी अलग- अलग कार्य तथा प्रभाव क्षेत्र हैं। ये नव ग्रह गोचरानुसार इन 12 राशियों को प्रभावित करते रहते हैं।

समय.-समय पर इन ग्रहें के पङने वाले दुष्प्रभावों के कारण मनुष्य कभी- कभी अनेक प्रकार की परेशानियाँ, बिमारियां, मानसिक कष्टों से ग्रस्त हो जाते है। कभी- कभी पूर्व जन्मों के ऋण भी मनुष्य की तरक्की, भागोदेय आदि में बाधा ङालते हैं। यदि जातक स्वयं शारिरिक रुप से अस्वस्थ रहता है तथा अस्वस्था के कारण अपनी उन्नति व सफलता के लिए संधर्ष न कर पा रहा हो तो यह जातक के स्वयं का ऋण होता है। उपाय स्वरूप जातक को जिन व्यक्तियों से उसका खून का रिश्ता है, उनसे थोङा-थोङा धन एकत्र करके यञादि करना चाहिए। साथ ही दीन- दुखियों की सेवा भी करनी चाहिए । जातक के स्वयं किए गये मंत्र, जाप, दान आदि करने से उचित परिणाम मिलते है।

कभी- कभी अधिक परिश्रम करने पर भी उचित फल प्राप्ति नहीं होती, बल्कि व्यर्थ की यात्राऔ आदि में धन व समय नष्ट होता है। अधिक संकटो का सामना करना पङता है। मित्र, संबधी विरोधी हो जाते हैं। इन सभी लक्षणों के साथ यदि कुङली में तृतीय भाव भी प्रभावित है तो जातक पर बहन ऋण होता है। इसके उपाय स्वरुप अपनी छोटी बहन की उचित सेवा, सहायता करनी चाहिए। बहन का कन्या दान करें। साथ ही दीन- दुखियों को भोजन कराने से मुक्ति मिलती है।

यदि घर में कलह का वातावरण हो , जमीन, जायदाद से संबधित परेशानियों के कारण मानसिक अशांति उत्पन्न हो रही हो तो चतुर्थ भाव दूषित होता है और मातृ ऋण होता है। इसका सबसे सार्थक उपाय है माता की सेवा करना । जननी की सेवा व आदर सम्मान कई जन्मों के पापों का नाश करती है। परिवार के सभी सदस्यों से थोङी- थोङी मात्रा में चाँदी लेकर नदी में प्रवाहित करें, तथा गरीबों व बेसहारा लोगों की आर्थिक सहायता करें। यदि विधार्थियों को विधा अध्यन में बाधाऐं उत्पन्न हो रहीं है, याद किया पाठ भूल जाता है तो यह गुरू का ऋण होता है। ऐसे विधार्थी गुरू जनों, माता, पिता, शिक्षको का सम्मान करें । रोज उनके चरण स्पर्श करके आशीर्वाद प्राप्त करें।, साथ ही माँ सरस्वती का पूजन करें विधा अध्ययन में उत्पन्न बाधाऐं दूर होती हैं।

आर्थिक समस्याओं के कारण बार -बार कर्ज लेना, रोगों व शत्रुओं का उत्पन्न होना साथ ही कुङली का छठा भाव भी प्रभावित जातक पर ननिहाल व मामा का ऋण प्रकट करता है। अतः उपाय स्वरुप मामा का उचित सम्मान करें तथा कार्य मामा की सलाह से करें तो उपरोक्त परेशानियों का निवारण होता है। यदि साझेदारी से किये व्यापार में हानि होती है, सफलता न मिलती हो, परिवार के मांगलिक कार्यो में व्यवधान पङ रहा हो तो साथ ही सप्तम भाव भी पीङित हो तो यह प्रदर्शित होता है कि घर की स्त्रियों को उचित सम्मान नही मिल रहा है। जिसे स्त्री ऋण भी कहते हैं। उपाय स्वरुप पत्नी तथा परिवार की अन्य स्त्रियों का उचित सम्मान करें। साथ ही किसी निर्धन कन्या का विवाह करें। बहुत अधिक मेहनत करने के बाद भी भाग्य साथ न दे रहा है । उच्च शिक्षा प्राप्ति में व्यवधान, सरकारी कार्यो में परेशानियां, मानहानि, सामाजिक व आर्थिक परेशनियां आदि लक्षण प्रकट हो रहे हो तो इसके सबसे कारगार उपाय हैं, पिता व गुरू की सेवा तथा छोटे भाई की पत्नी का उचित सम्मान करें। माता- पिता व गुरूजनों की सेवा दारा प्रसन्न करके लिया गया आर्शीवाद कभी भी निष्फल नही होता। बङे भाई- बहन, बुआ, चाचा आदि का किया गया मान- सम्मान, आदर, सत्कार व्यवसाय में लाभ का मार्ग प्रशस्त करता है।

इस प्रकार ग्रहों के कुप्रभावों के दारा परेशान व्यक्ति बिना कुछ खर्च किए सेवा भाव के दारा अपने ग्रहों के अशुभ प्रभाव के कम कर सकता है और सुखद जीवन य़ापन कर सकता है।




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