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घर में कहां हो पूजाघर

पं. योगेशजी उपाध्याय

घर में पूजाघर का अर्थ उपासना का ऐसा स्‍थल जहां बैठकर घर के सदस्‍य प्रतिदिन अपने आराध्‍य देवी-देवताओं की उपासना कर सकें। यह घर का ऐसा मंदिर होता हैं जिसमें देवी देवताओं की मूर्तियां स्‍थापित नहीं होती अपितु उनके प्रतीकात्‍मक चित्र आदि को सजाकर उनकी उपासना की जाती है। हालांकि आजकल बाजार में घर में पूजाघर की जगह मंदिन बनाकर उसमें अपने आराध्‍य देवी-देवताओं की मूर्तियां स्‍थापित करने का चलन भी शुरू हो गया है। लेकिन व्‍यवहारिक दृष्टि से यह उचित नहीं हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह घर के मंदिर में मूर्तियां स्‍थापित करना तो बहुत आसान है, लेकिन मंदिर में स्‍थापित मूर्तियों की नित्‍य पूजा का तो वैदिक विधान है वह बेहद महत्‍वपूर्ण और जिम्‍मेदारी भरा है। जिसमें सबसे बड़ी बाधा तो मंदिर की पवित्रता ही है। गृहस्‍थ जीवन काफी झंझावतों से भरा होता है।ऐसे में अपवादों को छोड़ दें तो घर के वातावरण में वैसी पवित्रता नहीं होती जो कि मंदिर में स्‍थापित मूर्तियों के हिसाब से जरूरी है। इससे अनजाने में हम घर के मंदिर में मूर्तियां स्‍थापित कर देव कृपा की जगह अपने देवी-देवताओं को कुपित कर बैठते हैं। जिसका दुष्‍परिणाम यह होता है कि हम परेशानियों में घिर जाते हैं। इससे बचना ही सर्वथा हितकर है। इससे बेहतर तो ये है कि हम घर के पूजाघर को मंदिर के माफिंद बना लें। इसमें देवी देवताओं की पीतल कास्‍य या मिटटी की मूर्तियां रख कर उनकी उपासना करें।

इस सलाह की एक वजह यह भी है कि फर्ज करो आपने घर के मंदिर में देवी-देवताओं अपने आराध्‍य देव की मूर्तियां स्‍थापित कर ली हैं। आपको मंदिर की पवित्रता और जिम्‍मेदारी का भी पूरा अहसास है। आप पूरी वैदिक रीति से उसका पालन भी कर रहे हैं। लेकिन इसकी क्‍या गारंटी है कि आप जैसा समर्पण भाव आपके बच्‍चों में भी बना रहेगा। वह भी आपकी तरह मंदिर की पवित्रता की जिम्‍मेदारी और महत्‍व को समझते हुए उसकी पवित्रता बनाए रखेंगे। ऐसी अवस्‍था में आप अनजाने में अपने बच्‍चों को घर में ऐसी धरोहर दे रहे हैं जिसका अनादर नई पीढ़ी के लिए कष्‍टकारी हो सकता है। हमारे ग्रंथों में तो ये भी उल्‍लेख है कि घर के मंदिर में आठ उंगल से बड़ी मेर्तियां नहीं होनी चाहिए। यह तो रहा पूजाघर के स्‍वरूप का मामला। अब प्रश्‍न ये उठता है कि घर में पूजाघर कहां होना चाहिए। यह प्रश्‍न इसलिए महत्‍वपूर्ण ही कि सही स्‍थान पर पूजाघर होने से न केवल घर में बहबूदी होती है बल्कि पूजा में मन भी विचलित नहीं होता। मन एकाग्रचित होकर पूजा करने से उसके सार्थक परणिाम मिलते हैं। घर के देवी देवता भी ऐसे परिवार से खुश रहते हैं। कहने का भाव ये है कि परिवार में खुशहाली का माहौल रहता है। इसके विपरीत यदि घर में पूजाघर यथोस्‍थान पर नहीं होगा तो आपका आत्‍मविश्‍वास डगमगाता रहेगा। पूजा करने के वाबजूद आपको वैसा फल नहीं मिल सकेगा जो आपको मिलना चाहिए।

वैसे भी हर घर की भौगोलिक स्थितियां अलग अलग होती है। किसी का घर किसी दिशा में बना है तो किसी का विपरीत दिशा में बना है। ऐसे में हमें वास्‍तु विदों की सलाह अच्‍छा मार्गदर्शन कर सकती है। वास्‍तु के अनुसार घर का पूजाघर उत्‍तर पूर्व अर्थात ईशान कोंण में होना चाहिए। ऐसी मान्‍यता है कि ईशान कोंण में स्‍वयं देवों के देव महादेव और प्रजापति ब्रहमा निवास करते हैं। यह वास्‍तु पुरुष का मस्‍तक क्षेत्र हैं। गुरू वृहस्‍पति ईशान कोंण के अधिपति देवता हैं। यही कारण है आध्‍यात्मिक कार्यों के लिए ईशान कोंण सबसे उपयुक्‍त है। इस दिशा में घर का ऐशवर्य निवास करता है। यह किसी भी भूखंड का सबसे संवेदनशील स्‍थान है। अत: ईशान कोंण में पूजाघर  बनाने का मतलब खुशहाली का वीजारोपण करना है। वास्‍तुविदों की बात करें तो जैसे अनुभवी ज्‍योतिषाचार्य किसी भी व्‍यक्ति का ललाट देख कर भविष्‍य वांच लेते हैं। ठीक वैसे ही स्थिति घर की होती है। अनुभवी वास्‍तुविद घर का ईशान कोंण देखकर उस घर की स्थितियों को वांच लेते हैं। अब प्रश्‍न उठता है कि घर के मंदिर में अपने आराध्‍य देवीदेवताओं की मूर्तियां किस क्रम में रखी जाएं।

वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार पूजाघर में आदि देव श्री गणेश लक्ष्‍मी  सालिगराम और मां भगवती की छोटी से मूर्तियों को बीच में रखें। इसी तरह प्रापति ब्रहमा,विष्‍णु आदि के चित्रों को पूर्व की दीवार पर पश्चिम की ओर मुंह करके टांगना चाहिए। कुछ लोग गएोश लक्ष्‍मी और कुबेर की मूर्तियां घर के प्रवेश द्वार पर लगाना शुभ मानते हैं । लेकिन सोचनीय बात ये है कि देवी देवता हमेशा पूजनीय होते हैं। अत: पूजनीय देवी देवताओं को घर का चौकीदार बनाना कहां तक उचित है। ऐसे में हम जाने अनजाने इनको मुख्‍य द्वार पर लगा कर इनका अपमान कर बैठते हैं। यह भी देखा गया है कि संयुक्‍त परिवारों में लोग अपने बैडरूम में ही पूजाघर बना लेते हैं। वास्‍तु के अनुसार यह सर्वथा गलत है। ऐसा करने से घर के परिजन हमेशा परेशानियों में घिरे रहते हैं। यह भी देखा गया है कि कुछ लोग मंदिर से प्राचीन मूर्तियां लाकर घर के पूजाघर में रख लेते हैं। यह भी अनुचित है। हमें इससे बचना चाहिए। इसी तरह घर के पूजाघर में युद्ध के चित्र महाभारत काल की तस्‍वीरें लगाने से भी बचना चाहिए। झाड़ू पौछा व कूढा पूजाघर में नहीं रखना चाहिए। गृहस्‍वामी यदि प्रतिदिन पूजा-पाठ के बाद हवन करते हों तो हवन कुड को पूजाघर के आग्रेय कोण में रखना चाहिए। पूजाघर में यदि अखंड दीपक जलाना हो तो वह भी इसी कोंण में रखना चाहिए।




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