मानस और गीता का तुलनात्‍मक विवेचन

हमारे धर्मग्रंथों में रामायण और गीता दो ऐसे धर्मग्रंथ हैं जो असाधारण कृतियां है। इनमें एक के नायक मर्यादा पुरुषोत्‍तम भगवान श्रीराम और दूसरे के नायक योगी पुरुष श्रीकृष्‍ण हैं । क्‍या ये दो अलग अलग धाराएं हैं। या एक ही धारा के दो रूप । रामकथा मर्मज्ञ स्‍व; पंडित रामकिंकर उपाध्‍याय जी ने इनका बड़ा ही सुंदर विवेचन किया है। प्रस्‍तुत हैं इसके अंश – संपादक

दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि।

भिरे बीर इत रामहि उत रावनहि बखानि॥

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि विभीषन भयउ अधीरा॥

अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥

नाथ न-रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥

सुनहु सखा यह कृपानिधाना। जेहि जय होइ सो स्यंदन आना॥

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृंढ़ ध्वजा पताका॥

बल बिबेक दम परहित धारे। छमा कृपा समजा रजु जोरे॥

ईस भजनु सारथी सुजाना। बिर$ित चर्म संतोष कृपाना॥

दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यांन कठिन कोदंडा।।

अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलेमुख नाना।।

कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥

सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहें न कतहुँ रिपु ताकें॥

महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।

जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥

अभी आपके समक्ष जो पंक्तियाँ पढ़ी गई वे रामचरित मानस के धर्मरथ प्रसंग की हैं। इस प्रसंग के माध्यम से मैं गीता तथा श्रीरामचरित मानस के एक दृश्य साम्य की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा। यह जो संवाद है। यह भी युद्ध क्षेत्र का संवाद है और दूसरी और युद्ध क्षेत्र का संवाद ही गीता है। भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण अपने मित्रों के माध्यम से जो दिव्य तत्व ज्ञान संसार के जीवों को देते हैं वही इन पंक्तियों में तथा गीता में निहित है। सर्वप्रथम भूमिका के रूप में भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण क संदर्भ में आपके सामने कुछ बातें स्पष्ट करने की चेष्टï की जायेगी। जब भगवान राम और भगवान कृष्ण इन दो नामों का उच्चारण किया जाता है तब अधिकांश व्यक्ति के मन में साधारणतया ऐसा भाव बनता है कि जैसे श्रीराम और श्रीकृष्ण दो भिन्न व्यक्ति हैं। तो जहाँ तक नाम, रूप और लीला की भिन्नता है उस दृष्टि से श्रीराम और श्रीकृष्ण के नाम में, उनकी लीलाओं में, उनके स्वरूप में कुछ न कुछ भिन्नता दिखाई देती है। लेकिन यदि हम तात्विक दृष्टि से विचार करें तो हमारे अन्त: करण की कई भ्रान्तियों का निवारण हो सकता है। ईश्वर केसन्दर्भ मेंं कभी-कभी बड़ा विवाद सा दिखाई देते है, पर जो लोग ईश्वर को साकार मानते हैं उनमें भी बड़ी भिन्नता दिखाई देती है। इस विषय मे जिनका किसी मत विशेष के प्रति पक्षपात है, वे वस्तुत: अपने मत की प्रति, अपने सिद्धांत के प्रति इतने आग्रही दिखाई देते हैं कि उन्हें दूसरों का मत सही प्रतीत नहं होता। जो निर्गुंण निराकारवादी हैं वे इस पर बड़ा बल देते हैं कि ईश्वर का कोई नाम और कोई रूप सम्भव नहीं है, क्योंकि नाम और रूप तो मिथ्या हैं। और ऐसी परिस्थितियों में जीव भले ही नाम और रूप से युक्त हो किन्तु ईश्वर तो नाम और रूप से ऊपर उठा हुआ है, इसीलिए वह निर्गुण-निराकार है। दूसरी ओर कुछ लोगों का आग्रह है कि जब यह संसार साकार है, इसमें आकृति है, रूप है, तो फिर इसका निर्माण करने वाला भी जो होगा वह रूपधारी ही होगा, क्योंकि निराकार भला साकार का निर्माण कैसे करेगा? इस तरह से दोनों अपने-अपने मत का समर्थन करते हैं। पर जहाँ सगुण-साकारवादियों का सम्बन्ध है उनमें भी एकता न होकर के भिन्न-भिन्न बातें कही जाती हैं। ग्रन्थों में, पुराणों में तथा आचार्यों के द्वारा भगवान के जिन नाम और रूपों का वर्णन किया गया है उनमें बड़ी भिन्नता दिखाई देती है। कुछ लोगों की मान्यता है कि वस्तुत: समग्र ईश्वर की परिपूर्णता तो भगवान शंकर में है अन्य लोग उनके केवल अंशमात्र हैं। किन्तु उतने ही बल से कुछ लोगों का आग्रह है कि, नहीं वस्तुत: पूर्ण भगवान तो विष्णु हैं और  जो अन्य हैं, वे तो उनकी अपेक्षा न्यून हैं या अश्ं है। जो आदिशक्ति दुर्गा के पुजारी हैं, उनका आग्रह है कि सृष्टि के मूल में जो ईश्वरीय शक्ति है वह तो दुर्गा ही हैं।

यही समस्या आती है श्रीराम और श्रीकृष्ण के सन्दर्भ में भी। जो श्रीराम के नाम का जप करते हैं, उनकी पूजा करते हैं, उनकी आराधना करते हैं, उनका ऐसा आग्रह रहता है कि नहीं, सर्वश्रेष्ठï ईश्वर तो श्रीराम हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर भी उनके अंश हैं, श्रीकृष्ण भी उनके अंश हैं, इसलिए परिपूर्णता तो केवल राम में है। दूसरी ओर भगवान कृष्ण के जो भक्त हैं, वे श्रीमद्भागवत के श्लोंको का उद्धरण देते हुए यह कहते हैं कि – अन्येयांश कला प्रोक्तं कृष्णस्तु भगवान स्वयं– अन्य जिनका वर्णन किया गया है वे अंश कला मात्र हैं, श्रीकृष्ण ही साक्षात् भगवान हैं। तो फिर स्वाभाविक रूप से व्यक्ति के अन्त:-करण में और विशेषरूप से जो बुद्धि और तर्क के सन्दर्भ में विचार करते हैं उनके मस्तिष्क में या तो तो संशय उत्पन्न होता है या परस्पर टकराहट होती है। गोस्वामी जी ने इसका जो समाधान दिया वह बड़े काम का है तथा उस समाधान को यदि हम स्वीकार कर लें तो फिर विवाद और टकराहट की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।  गोस्वामी जी के जीवन में यह गाथा बड़ी प्रसिद्घ है कि जब वे वृन्दावन गए और भगवान कृष्ण के दर्शन के लिए पधारे, उस समय उन्होंने भगवान कृष्ण से यह अनुरोध किया कि आप वंशी छोड़कर धनुषबाण ले लीजिए तब मैं आपको प्रणाम करूँगा। इस दोहे के द्वारा वे यह आग्रह करते हैं कि गोस्वामी जो श्रीराम के इतने बड़े भक्त थे कि उन्होंने श्रीकृष्ण को भी प्रणाम नहीं किया। पर वस्तुत: इस प्रसंग से जो लोग ऐसा अर्थ लेते हैं उसका कारण गोस्वामी जी के विचारों को न समझ पाना ही है। सर्वप्रथम तो आप इसी दृष्टि से विचार कीजिए कि श्रीराम और भगवान कृष्ण के प्रति यदि भिन्नता की इतनी ही भावना तुलसीदास जी में थी तो उन्हें वृन्दावन जाने की आवश्यकता ही क्या थी? क्या उन्हें पहले यह पता था। कि वृन्दावन श्रीकृष्ण की लीलास्थली है? और जब वे मन्दिर मे दर्शन करने के लिए गए तब भी उन्हें यह अच्छी तरह से पता था कि यह भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर हैं। भगवान राम का नहीं, किंतु फिर भी जब वे भगवान कृष्ण के धाम में गए, भगवान कृष्ण के मन्दिर में गए तब फिर यह कहाँ सिद्घ होता है कि वे श्रीराम के इतने अनन्य थे कि उन्होंने श्रीकृष्ण को नमन ही नहीं किया? असल में वहँ जो नमन न करने की बात है वह तो बड़ी मीठी है। उस कथा-प्रसंग से तो यही सिद्घ होता है कि गोस्वामी जी वस्तुत: श्रीराम और श्रीकृष्ण में रंच मात्र कोई भेद नहीं मानते। इस घटना से भेद की नहीं अपितु अभेद की सिद्धि होती है। यद्यपि वहाँ पर गोस्वामी जी गए तो थे प्रणाम ही करने के लिए, कोई और उद्देश्य तो लेकर गए नहीं थे, लेकिन उसके साथ जो एक गाथा जुड़ी हुई है वह बड़े महत्व की है। कहा जाता है कि वहाँ पर एक परशुराम नाम के श्रीकृष्ण-भक्त थे। उन्होंने जब गोस्वामी जी को कृष्ण मन्दिर में देखा तो  थोड़ा सा व्यंग्य करते हुए यह दोहा कहा –

अपने-अपने इष्ट को नमन करै सब कोय।

परशुराम जो आन को नवै सो मूरख होय॥

प्रत्येक भक्त अपने-अपने इष्ट  को प्रणाम करता है, पर जो अन्य के इष्ट-देव को प्रणाम करता है वह तो मूर्ख है। वस्तुत: उस समय गोस्वामी जी का उद्देश्य परशुराम जी का तथा उस प्रकार से जो लोग सोचने वाले थे उनके भ्रम को दूर करना था। क्योंकि यदि वे भगवान कृष्ण के मन्दिर से यह दोहा सुनकर निकल जाते, वृन्दावन छोड़कर चले जाते, तब तो यही सिद्घ होता कि सचमुच वे श्रीकृष्ण तथा श्रीराम को बिल्कुल अलग मानते थे, इसलिए उनके धाम और उनके मन्दिर में भी नहीं रूके। पर न तो वे धाम से गए और न ही मन्दिर से निकले, बल्कि भगवान के सामने मुस्कुराते हुए खड़े हो गए। और तब उन्होंने भगवान के समक्ष जो दोहा कहा वह तो सर्व विदित ही है। उस दोहे में गोस्वामी जी जब यह कहते हैं कि – कहा कहौं छबि आजु की भले बने हो नाथ।  तो प्रश्र यह है कि इस ‘नाथ  शब्द का भगवान कृष्ण के लिए ही प्रयुक्त किया है क्योंकि अभी तो भगवान श्रीकृष्ण ही खड़े हैं। उनको गोस्वामी जी नाथ भी कहकर पुकार रहे हैं और उनकी छबि की प्रशंसा भी कर रहे हैं। पर तुलसीदास जी जब भगवान  कृष्ण से यह अनुरोध करते हैं कि जरा वंशी छोड़कर धनुष को ले लीजिए। इससे तो यही सिद्ध होता है कि वस्तुत: वह दोनों को एक ही मानते थे। हां यह बात और थी कि उनको वंशी की तुलना में धनुष अधिक प्रिय था। इसलिए उन्होंने कहा प्रभु जरा इनका भ्रम मिटाने के लिए दिखा तो दीजिए कि आप ही वंशीधर हैं, और आप ही धनुर्धर हैं। परन्तु जो भक्त आपसे जैसा बनने के लिए कहता है आप वैसे ही बन जाते हैं। तो भाई! इस दोहे तथा इस घटना से यह सिद्ध नहीं होता कि गोस्वामी जी की दृष्टि में दोनों में अत्यन्त भेद था, अपितु इससे तो यही सिद्घ होता है कि गोस्वामी जी की दृष्टि में दोनों में बिल्कुल अभिन्नता थी। उपर्युक्त प्रसंग की दृष्टïन्त के रूप में हम यों कह सकते हैं कि जैसे आपको कोई अत्यन्त प्रिय व्यक्ति हो और वह आपका प्रिय व्यक्ति वस्त्र धारण करके खड़ा हो तथा अनेक लोग उसे देख रहे हों। किन्तु समस्या यह है कि प्रत्येक व्यक्ति की आँखें अलग-अलग ढ़ंग की होती हैं। किसी को किसी रंग का वस्त्र अच्छा लगता है और किसी को किसी रंग का। यह प्रत्येक व्यक्ति की आँखों की अलग-अलग प्रकृति है। किन्तु वस्त्र इत्यादि धारण करके खड़े हुए अपने प्यारे मित्र से आप अगर यह कहें कि भाई! आपका यह कपड़ा अच्छा तो है पर मुझे तो आप तब और भी प्‍यारे लगते हैं जब आप उस रंग का कपड़ा पहनते हैं। और आपका मित्र अगर आपसे स्नेह करने वाला होगा तो मुस्करा कर कहेगा कि भाई तुम्हें अगर दूसरा वस्त्र पसन्द है तो चलो हम वहीं वस्त्र पहन लेतें हैं। वस्तुत: गोस्वामी जी का तात्पर्य तो यह था कि आप ही वंशीधर हैं, आप ही धनुर्धर हैं, आप श्रीकृष्ण हैं, आप ही श्रीराम हैं, पर इनके मन में यह भ्रान्ति हो गई है कि मैं दूसरे मन्दिर में आ गया हूँ। किन्तु नहीं महाराज यह तो आपका ही धाम है, आपका ही मन्दिर है, केवल इनका भ्रम दूर करने के लिए जरा वंशी छोड़कर धनुषबाण ले लीजिए तो ये समझ लेंगे कि वस्तुत: आपके इस और उस (श्रीकृष्ण और श्रीराम) रूप में कोई भिन्नता नहीं है। और फिर भाई, अगर भगवान कृष्ण और भगवान राम अभिन्न होते तो यह सुनकर गोस्वामी जी को डाँटकर कहते कि तुम निकल जाओ मेरे मन्दिर से। पर वर्णन यह आता है कि इस प्रार्थना को सुनकर तुरन्त प्रभु ने वंशी हटाकर धनुषबाण ले लिया। इससे यही सिद्घ होता है कि गोस्वामी जी की दृष्टि में श्रीकृष्ण और श्रीराम में तत्वत: कोई भिन्नता नहीं है। इसीलिए वे भगवान राम के सन्दर्भ में जहाँ पर अनेक ग्रन्थों की रचना करते हैं वहाँ ‘कृष्ण गीतावली के रूप में भगवान कृष्ण के सन्दर्भ में भी उन्होंने बड़े ही सुन्दर ग्रन्थ की रचना की है। और ‘विनय पत्रिका के पदों में आप यह पायेंगे कि ‘विनय पत्रिका को जहाँ भगवान राम के नाम लिखा गया पत्र है वहाँ ‘विनय पत्रिका में कई पद ऐसे हैं जिनमें गोस्वामी जी श्रीराम का वर्णन तो कर रहे  हैं, पर श्रीराम का वर्णन करते हुए कहीं पर भी उस पूरे पद में श्रीराम की लीला का रंच मात्र भी वर्णन नहीं है, अपितु उस पूरे पद में श्रीकृष्ण की लीला का वर्णन है।                                  क्रमश :