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भारत का प्रथम राष्‍ट्रीय पर्व नव संवत्‍सर

भारतीय तत्व चिन्तकों के अनुसार नव संवत्सर चैत्र शुक्ला प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है। इस सृष्टि का प्रथम दिन होने के कारण यह दिन सर्वथा महत्वपूर्ण माना जाता है। प्राप्त प्रमाणों के अनुसार ब्रह्मा की सृष्टि की रचना इसी दिन से हुई है, यथा ब्रह्मï पुराण में उल्लेख है- चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनि अर्थात ब्रह्मा ने चैत्र मास के प्रथम दिन सृष्टि की रचना की।  स्मृति-कौस्तुभ में भी इस प्रकार का विवरण प्राप्त होता है – कृते च प्रथमे चैत्रे प्रतिपच्छक्लपक्षगा। मत्स्यरूप: कुमार्याभ्य,अवतीर्णों हरि: स्वयम्। संवत्सर की महिमा का उल्लेख अथर्ववेद में भी प्राप्त होता है – संवत्सर प्रतिमां यां त्वां राज्युपस्गह॥ सा न आयुष्मती प्रजा रायरूषोषेण संसृज॥(अर्थवेद 3-6-90 )

अर्थात् संवत्सर की प्रतिमा स्वरूप हम जिस प्रभु की उपासना करते हैं, वह हमें दीर्घायुवाली प्रजा तथा धन से सतंत युक्त करें।  इस प्रकार हमें विदित होता है कि संवत्सर से हमारी अनेक धार्मिक तथा ऐतिहासिक परम्पराएँ जुड़ी हुई हैं। संवत्सर के प्रारम्भ में ही सर्वप्रथम भगवान् का मत्स्य रूपी अवतार है। जिसकी मान्यताएँ न्यूनाधिक रूप में सर्वत्र विश्व में त्याप्त हैं। सृष्टि के विशाल कार्य को धारण करने के लिए है। मत्स्य अवतार का सर्वाधिक महत्तव है। जो सृष्टि के आधार का बीज है। संवत्सर की परिभाषा व्याकरण के अनुसार संतसन्ति ऋतुवोऽच अर्थात् जिसमें समस्त ऋतुएँ रहती हैं। उसे ‘संवत्सर कहते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार ग्रह-नक्षत्र तापस्थ काय जितने समय में इनका पूर्ण चक्र लगा लेता है वह समय संवत्सर कहा जाता है। भागवत के तृतीय स्कन्द के 11वें अध्याय में काल के सूक्ष्म तथा स्थूल 29 भेद व्यवहार की दृष्टिï से किए गए हैं, यद्यपि कम्ल अखण्ड एवं अंमघ है। ये 29 भेद क्रमश: इस प्रकार हैं :- अणु, मुहूर्त, प्रहर ,दिन, पक्ष ,मास,ऋतु,अयन, संवत्‍सर,युग, भन्‍वतर तथा कल्‍प। इन सभी के नाम का स्‍पष्‍ट उल्‍ल्‍ेख संवत्‍सर के पांच नाम हैं।

संवत्सर: परिवत्सर इडावत्सर एव च। अनुवत्सरो वत्सरश्चैव विदुरैवं प्रभाष्यते॥  तस्मै वलिं हरत वत्सर पञ्चकाय॥ ( श्रीमद्भागवत 3-11-14-15)  इन पाँचों में वर्ष का पर्यायवाची शब्द ‘वत्सर ही प्रधान है।  सृष्टि के प्रारम्भ से आज तक भारतीय पञ्चाग्रमें के अनुसार 1955885107 एक अरब पिच्चानवे करोड़ अठ्ठावन लाख पचासी हजार एक सौ सात वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। इस सृष्टि की आयु भारतीय मान्यतानुसार 4320000000 चार अबर बत्तीस करोड़ वर्ष है। चौदह मन्वन्तरों में 6 मन्वन्तर व्यतीत हो चुके हैं। सातवाँ वैवस्वत मन्वन्तर चल रहा है। इकहत्तर चतुर्युगी वाले इस मन्वन्तर की चतुर्युगी में २८वाँ कलियुग चल रहा है, जिसका अभी प्रथम चरण ही है। इस समय कलियुग के 5107 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। कलयुग का प्रमाण चार लाख बत्तीस हजार वर्षों का है। इस विवरण से सर्वथा स्पष्ट है कि भारतीय यह संवत्सर पर्व सर्वाधिक प्राचीन है, जिसे हम सृष्टि के प्रथम वर्ष से ही मनाते चले आ रहे हैं। कल्पारम्भ से आज तक एक अरब सत्तानवें करोड़ उन्तीस लाख उन्चास हजार एक सौ सात वर्ष व्यतीत हो गए हैं। इस समय वाराह कल्प चल रहा है। ब्राह्यï और पादम व्यतीत हो चुके हैं। भारतीय वाड्मय में नौ वर्ष गणनाएँ सर्वथा प्रसिद्घ हैं, जिनमें ब्राह्मï, दिव्य, पिच्य, प्राजापत्य, वार्हस्पत्य, नाक्षत्र, सौर, चान्द्र और सावन। ब्राह्मï, दिव्य पित्र्य ये तीन वर्ष गणनाएँ युग गणना के समय कार्य में आती हैं। प्राजापत्यगणना वर्ष के शुभाशुभ फल में की जाती है। बार्हस्पत्य गणना ‘कुम्भ आदि महापर्व, सिंहगत बृहस्पति के समय अविवाह, क्षय, वर्ष एवं अधिक वर्ष के लिए भी उपयुक्त मानी गयी है। श्रौत यज्ञ में नक्षत्र गणना गृहीत की जाती है। अयन गति एवं ऋतु सम्पात में तथा विवाहादि कार्य में सौर-गणना का उपयोग होता है। चान्द्र गणना का प्रभाव ज्वार-भाटा तथा स्त्रियों के रजोधर्म आदि प्राकृतिक परिवर्तनों में परिलक्षित होता है, इस प्रकार इन आंठों गणनों में ऐक्य निर्धारण करने के लिए सूर्य-चन्द्र दोनों पर आधारित विभिन्न गणनाओं का माध्यम प्रकटित कर ‘सावन गणना का विचार किया जाता है। जिसमें तिथि क्षय, तिथि वृद्घि तथा मासाधिक्य का विवेचन गृहीत है। आज भारतीय ज्योतिष में इन सबके होते हुए भी चार कालों का ही प्रचलन अधिक है यथा – सौर काल, चान्द्र काल, नाक्षत्र काल, सावन काल। इसी के आधार पर वर्ष मास की गणना भी की जाती हैं। इन कालों की गणना से ही हमारे समग्र कार्यक्रम निश्चित होते हैं। अत: यह संवत्सर का पूर्ण विवरण इन कालों में सर्वथा समाहित है। इनमें भी सौर वर्ष एवं चान्द्र सर्वथा उपयोगी है। सौर वर्ष 365 दिन 15 घण्टे 11 मिनट का होता है। 354 दिन का चान्द्र वर्ष होता है। स्थूलत: व्यवहार में मध्यमान से 360 दिन का वर्ष प्रचलित है। विश्व में प्रमुख संवत्सरों की गणना में 36  संवत्सरों का उल्लेख है, जिनमें 20 संवत् भारत के प्रसिद्घ है, जिनके नाम इस प्रकार है, यहाँ यह विवरण इसलिए प्रस्तुत किया जा रहा है कि किसी राष्ट्र की प्राचीनता का परिचय उसके संवत्सर से विदित होता है – आज की तिथि के अनुसार भारत के संवत्सर – गान्धी 58, नानक- 536, हर्ष-1396, बंला-1410, फसली-1414, कलचुरी-1755, शक-1928, विक्रम-2063, शांकर-2284, महावीर जैन-2532-33,  बुद्घ-2579, कलि-5017, गीता-5143, युधिष्ठिïर-5210, कृष्ण-1232, राम-181499107 वर्ष। उसके अतिरिक्त भारत के अतिरिक्त हिजरी सन् -1427, ईसवी सन् 2006 , सिकन्दरी -2360, यूनानी-2755, ईरानी-3773 , इब्राहीम-4000, नूसा-4444, यहूदी-2755, ईराकी-5708, आदम-7356। अन्य संवत्सरों में चीनी, टर्किस, मिश्री, पारसी, खताई आदि भी प्रसिद्घ है। यह विवरण सनातन धर्म मण्डल ग्वालियर से प्रकाशित ‘अमृत महोत्सव स्मारिका में विशेष रूप से प्रदत्त है। आर्य समाज में ‘दयानन्द संवत् का भी प्रचलन है। भारतीय संवत्सरों की पूर्णता इस बात पर निर्भर करती है कि जो पर्व जिस ऋतु में होता है, सृष्टि के प्रारम्भ से वह पर्व उसी ऋतु में आज भी पाया जाता है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण एक और भी है। सूर्यग्रहण सदैव अमावस्या को ही होता है तथा चन्द्रगहण पूर्णिमा को ही निश्चित होता है। भारत के अतिरिक्त विश्व की काल गणना का कोई ऐसा आधार निश्चित नहीं है, जो पूर्ण निश्चितता को सिद्घ कर सके। यह भारत का वैशिष्ठा है, जिसमें निश्चितता है। 12 मास एवं 7 वारों का ही विश्व में सर्वत्र प्रचलन इस मान्यता का पूर्णतया द्योतक है भारतीय ज्योतिष में संवत्सरों के 60 नाम हैं, तीन विशांति है – ब्रह्मा की २०, विष्णु की २० तथा शिव की २० ये क्रमश: निरन्तर आती रहती है। इस वर्ष ब्रह्मा विष्णु की विशंति में ३३वाँ विकारी नाम का संवत्सर है। जिसका फल प्राय: अशोभन है। संवत्सर के प्रारम्भ करने की भारतीय विधि भी अति विचित्र है जिसके नाम से जो संवत्सर प्रारम्भ किया जाता है। उस व्यक्ति को अपने राष्टï्र की समग्र प्रजा का ऋण समाप्त  (चुकाना चाहिए, तभी संवत्सर चलाने का वह अधिकारी बन सकता है। विक्रमादित्य ने यह कार्य प्रजा के ऋण को चुकाने के पश्चात् ही संवत् प्रारम्भ किया था, जिसकी प्रतिष्ठा आज भी पूर्णतया विद्यमान है। जन-जन में विक्रमादित्य के प्रति श्रद्घा की भावना इस बात का प्रबल प्रमाण है। हमारे प्रत्येक धार्मिक कार्यों में कार्यारम्भ से पूर्व संकल्प का विधान है। जिसमें समग्र आज तक की कालगणना का उल्लेख होता है।

भारतीय पद्घति के अनुसार नव संवत्सर के दिन प्रात: वर्षाधिव का पूजन, हवनादि का विधान है। इस दिन पंच्चांग का श्रवण किसी विदुषी ज्‍योतिष द्वारा श्रवण करना पुण्यप्रद है। घर-घर में चौंक पूरकर मांगलिक कार्य कराने की विधि सर्वत्र विहित है। घर पर ध्वज-पताका लगानी शुभ मानी जाती है। वर्ष भर के सर्वथा मंगल होने की शुभ मानी जाती है। वर्ष भर में सर्वथा मंगल होने की अपने-अपने प्रतिष्ठानों पर प्रार्थनाएँ की जाती हैं। राष्ट्र की समुन्नति के लिए वेदघोष, वेदवेत्ताओं द्वारा सम्पन्न कराया जाता है। राष्‍ट्रीय प्रार्थनाओं का सर्वत्र समायोजन कराने का शास्त्रीय विधान विहित है। इस दिन राष्ट्र की समुन्नति हेतु तथा व कृषि-उत्पादन में सफलता हेतु वायु परीक्षण का भी विधान है, जिसकी विशेष सर्वत्र आवश्यकता है। इस दिन प्रात: नीम की कोमल पत्तियाँ, काली मिर्च, जीरा, हींग, सैंधा नमक, अजवायन-सबको पीसकर गोली बनाकर खाने से वर्ष भर के लिए स्वास्थ्य के लिए उत्तम माना जाता है। इसी दिन प्रात: स्वर-साधना करने वाले व्यक्ति सूर्य स्वर, चन्द्र स्वर, सुषुम्णा तथा पच्चतत्तवों के चिन्तन द्वारा पूरे वर्ष के शुभाशुभ फल को जान लेते हैं, तदनुसार अपना जीवन व्यतीत करने का, स्वयं तथा समाज को चलाने का प्रयत्न करते हैं।

इसी दिन से नवरात्र प्रारम्भ होता है। नौ दिन तक माँ भगवती की आराधना राष्ट्र की सुख: समृद्घि एवं शान्ति के लिए प्रारम्भ की जाती हैं, क्योंकि राष्ट्र की सुख, शान्ति और समृद्घि में ही सबकी सुख, शान्ति और समृद्घि है – इसी हेतु इस मातृशक्ति की आराधना का उपक्रम प्रस्तुत होता है – ”उत्तिष्ठïत-जाग्रत-प्रात्यवरान् निबोधत का उदघोष नव वर्ष के लिए नितान्ता आवश्यक है – जिसकी सभी को महती आवश्यकता है। भारत में विशेष प्रचलित संवत्सरों के विकास क्रम का ऐतिहासिक वक्ष इस प्रकार है – युधिष्ठिïर संवत् इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) में कलियुग के 3044 वर्ष तक, इसके पश्चात् विक्रम संवत् प्रारम्भ हुआ है। विक्रम संवत् के 133 वर्ष पश्चात् अथवा ईसवीय सन् से 78 वर्ष पश्चात् शालिवाहन, शक (संवत्) का प्रारम्भ, विक्रम संवत् के 56 वर्ष पश्चात् ईसवीय, सन् का प्रारम्भ है। शालिवाहन शक संवत् में से 503 वर्ष पश्चात् हिजरी सन् तथा हिजरी सन् में से 12 वर्ष पश्चात् फसली सन् प्रारम्भ हुआ। इसके अतिरिक्त बंगाली सन् बंगाल प्रान्त में सर्वथा प्रचलित है। इसकी गणना मेष की संक्रान्ति से की जाती है। यह सौर वर्ष से माना जाता है, इसी दिन पंजाब में वैशाखी पर्व मनाया जाता है। यह सन् ईसवीय सन् से 594 वर्ष पश्चात् प्रारम्भ हुआ है। इस प्रकार ये समग्र संवत् सन् आदि काल की गणना का पूर्णतया उल्लेख करते हैं। वर्ष का मान जीवन में सर्वाधिक महत्व रखता है, इसलिए सर्वत्र विश्व में वर्षावधि कार्यों का सतत उल्लेख हैं। अपने कार्यों की रूपरेखा-का निर्धारण एक वर्ष की अवधि के लिए ही विशेष रूप से निश्चित करते हैं, अत: जीवन में नव संवत्सर का सर्वाधिक महत्व हो जाता है। विगत वर्षों की सफलताओं -असफलताओं का लेखा-जोखा देखकर अग्रिम वर्ष के लिए सत्संकल्प करते हुए अभूतपूर्व उत्साह के साथ जीवन की सफलताओं के लिए जुट जाते हैं। इसलिए समाज में सर्वत्र वार्षिकोत्सव मनाये जाने की परम्परा प्रचलित हैं। हमारा नव संवत्सर मानव की सृष्टि का प्रथम दिन होने से इसका विशेष महत्व प्रकटित होता है। यदि इसे सृष्टि के विकास का प्रथम दिन माना जाए, तो इसमें अत्यधिक गम्भीरता का उद्बोधन होता है। सृष्टि का किसी एक ही स्थान से होना सर्वसम्मत है,अत: यह दिन बिना किसी भेदभाव के समग्र प्राणिसमूह के विकास का दिन होने से विश्व विकास दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। भारत का तो यह सर्वमान्‍य राष्‍ट्रीय पर्व ही है जिसमें समग्र हित की भावना सर्वथा निहित है।




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