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चैत्र के नवरात्रे

नवरात्रि पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। एक चैत्र में जिन्‍हें वासंतिक नवरात्रि एवं दूसरा आश्विन यानि कि क्‍वार मास में मनाया जाता है। इसे शारदीय नवरात्रि कहा जाता है। यह पर्व भारतीय गृहस्‍थों के लिए शक्ति पूजन – संचयन और शक्ति संवर्धन का दिवस है। नवरात्रि में मां की आराधना तथा शास्‍त्र युक्‍त व्रतादि के नियम द्वारा हम आध्‍यात्मिक आदिभौतिक आदिदैविक शक्ति संचयन करके भविष्‍य की जीवन यात्रा के पथ पर अग्रगामी होती हैं। यह त्रिविद शक्ति एकत्रित कैसे होती है। यही जानना अति आवश्‍यक है। सबसे बड़ा सवाल तो यही हे कि नवरात्रि पर्व चैत्र और क्‍वार के महीने में ही क्‍यों मनाया जाता है। यथार्थ में तो ऋतु छह होती हैं। वसंत,ग्रीष्‍म,बर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर। लेकिन वास्‍तविक रूप से देखें तो ऋतु दो ही प्रधान हैं। गर्मी और सर्दी। ये दोनों महीने हमारे देश में फसलीय दृष्टिकोंण से भी महत्‍वपूर्ण हैं। चैत्र में आषाड़ी गेहूं की फसल तैयार होकर घरों में आने लगती है। जबकि क्‍वार में श्रावणी फसल धान तैयार हो जाती है। इन नई फसलों के अन्‍न से पहले हम विशंभर और जगदंबा की आराधना का अच्‍छी फसल के लिए कृतज्ञता व्‍यक्‍त करते हैं। गर्मियों का आगमन चैत्र और सर्दियों का क्‍वार से होता है। जैसे ही ऋतु आगमन होता है संपूर्ण आदिभौतिक संसार में हलचल आरंभ हो जाती है। वृक्ष लता गुल्‍मादि  वनस्‍पति, जल और नव  समेत समस्‍त वायुमंडल में परिवर्तन शुरू हो जाता है। ये दोनों महीने दोनों ऋतुओं के पूर्वापर संधिकाल हैं। अत: हमारे स्‍वास्‍थ्‍य पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है।

चैत्र में गर्मी के आरंभ होने से पिछले कई महीनों से जमा हुआ हमारे तन का रक्‍त उमड़ने लगता है। मात्र रक्‍त की ही बात नहीं बल्कि यह नियम शरीर के बात पित्‍त कफ पर भी पड़ता है। अत: यही कारण है कि विश्‍व के अधिकांश रोगी इन दोनों महीनों में या तो शीघ्र स्‍वस्‍थ हो जाते हैं या फिर मृत्‍यु को प्राप्‍त हो जाते हैं। इसलिए वेदों में जीवेम शरद: शतम वंदना करते हुए सौ शरद समय पर्यंत की वंदना की गई है। क्‍योंकि वसंत की अपेक्षा शरद ऋतु का प्रकोप काफी भयानक होता है। यदि शरद मंगलमय व्‍यतीत हो जाए तो वर्ष पर्यंत जीवन की आशा बंधी रहती है। इसलिए वर्ष का दूसरा नाम ही शरद हो गया है। शास्‍त्रवेदाओं ने संधिकाल के इन्‍ही महीनों में शरीर को पूर्व रूप से स्‍वस्‍थ रखने के लिए नौ दिन तक विशेष व्रत का विधान किया है। घर में मां जगदंबा की आराधना के लिए जौ बोए जाते हैं। घर के कोने में मां जगदंबे के कलश की स्‍थापना कर घी का अंखड दीपक जलाया जाता है। धूप-गूगल अगरबत्‍ती कपूरादि सुगंधित वस्‍तुओं के धूए से कीटाणु नष्‍ट होते हैं। इससे शारीरिक शक्ति का बर्धन होता है। इस दौरान दुर्गा शप्‍तशती, देवी भागवत, वाल्‍मीकि रामायण , रामचरित मानस आदि का पाठ करने से मानसिक शक्ति का संचयन होता है।  इस बार 8 अप्रैल 2016 शुक्रवार से चैत्र के नवरात्रे प्रारंभ हो रहे हैं।




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