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हिंदू- मुसलिम एकता की मिसाल – हनुमान गढ़ी का दरबार

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह

जो भी अयोध्या जाता है वह हनुमानगढ़ी का दर्शन जरूर करता है। अगर किसी कारण से कोई मंदिर के भीतर न जा सके तो भी सड़क चलते वह इस सबसे बुलंद मंदिर का दर्शन जरूर पा लेता है और वहीं से प्रणाम कर लेता है। पूर्वी उ.प्र.के जनमानस में हनुमानगढ़ी के प्रति अगाध आस्था है। वैसे देश-विदेश से भी बडी़ संख्या में लोग इस भव्य मंदिर का दर्शन करने पहुंचते हैं। रामनवमी के दिन तो इस मंदिर पर जैसे जनसमुद्र उमड़ पड़ता है। हर मंगलवार और शनिवार को भक्तगण लड्डू चढ़ाने पहुंचते हैं। इन भक्तों में कई ऐसे होते हैं जिनका प्रसाद पहले ही हनुमानजी के सैनिक यानि बंदर छीन लेते हैं। कई महिलाओं के पल्लू में बंधे पैसे भी वे ले लेते हैं,पर किसी को काटते नहीं है। मंदिर के भीतर कई जगह संगमरमर की पटिट्यों पर दानदाताओं के नाम अंकित हैं और कई जगहों पर हनुमान चालीसा अंकित है। यह ऐतिहासिक मंदिर बेहद प्राचीन माना जाता है। इसी नाते इसकी महत्ता भी बहुत है। माना जाता है कि लंका के राजा रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद भगवान राम जब अयोध्या लौटे तो हनुमानजी ने जहां रहना शुरू किया उसका नाम हनुमानगढ़ या हनुमान कोट पड़ गया। यहीं से हनुमानजी रामकोट की रक्षा करते थे। यानि मंदिर उसी स्थान पर बना है, जिससे इस स्थल की महत्ता बढ़ जाती है। मुख्य मंदिर में माता अंजनी की गोद में पवनसुत विराजमान है। ऐसी मान्यता है कि पुष्प तुलसीदल से आच्छादित इस विशाल व दिव्य प्रतिमा के दर्शन से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। अयोध्या के मध्य में स्थित हनुमानगढ़ी तक पहुंचने के लिए 76 सीढ़ी चढऩी पड़ती हैं। इसकी बनावट जामा मस्जिद की सीढिय़ों जैसी है। यही अयोध्या की सबसे ऊंची इमारत भी है जो चारों तरफ से नजर आ जाती है। इस विशाल मंदिर तथा उसका आवासीय परिसर करीब 52 बीघे में फैला है। यही नहीं वृंदावन,नासिक,उज्जैन, जगन्नाथपुरी समेत देश के कई नगरों में इस मंदिर की संपत्तियां,अखाड़े तथा बैठक हैं। यहीं की सगरिया पट्टी के पास समस्तीपुर में 100 एकड़ जमीन है, इस पर खेती हो रही है। गंगासागर का प्रसिद्द कपिलमुनि मंदिर भी हनुमानगढ़ी से जुड़ा है। हनुमानगढ़ी की देख रेख के लिए करीब 100 लोग तैनात हैं। मंदिर की आय से ही इनको नियमित वेतन दिया जाता है। इसके अलावा मंदिर के पास करीब 300 गाएं हैं। मंदिर की संपत्तियों की देखरेख और हिसाब किताब के लिए आधा दर्जन मुख्तार नियुक्त हैं। इस मंदिर के अतीत को लेकर तमाम कहानियां हैं जो इस जगह की महत्ता को वर्णित करती हैं। कहा जाता है कि पहले यहां इमली का एक पेड़ था ,जहां हनुमानजी रहा करते थे और उनकी नियमित पूजा अर्चना होती थी। एक बार अवध के बादशाह को कुष्ठ रोग हो गया और तमाम हकीम वैद्य और फकीरों की दुआ या दवा से यह ठीक नहीं हो पाया पर यहां के चरणामृत से वह ठीक हो गया। यहां के चमत्कारों के कई किस्से हैं जो अवध के नवाबों से जुड़े हैं। यह तो सच है कि अवध के नवाब हनुमानगढ़ी की महत्ता से इतने प्रभावित थे कि उन्होने इसके निर्माण के लिए जी खोल कर दान दिया और बहुत ख्याल रखा। हनुमानगढ़ी का मंदिर सफदरजंग तथा नवाब शुजाउद्दौला (1739-1754) के आदेश से बना। आसफुद्दौला के शासनकाल में भी मंदिर को काफी समर्थन मिला। कहा जाता है कि सफदरजंग ने हनुमानगढ़ी बनवाने के लिए निर्वाणी अखाड़े को जमीन प्रदान की थी और बाकी सुविधाऐं भी मुहैया करायीं थीं। आज भी हनुमानगढ़ी के पास बड़ी जमींदारी है और बिहार तक इस मंदिर के पास जमीने हैं।

        गढीं का अर्थ है किला। सारे विश्व में शायद यह अकेला हनुमानजी का मंदिर है जिसके आगे किला शव्द का इस्तेमाल हुआ है। कोई भी किला छोटा मोटा तो होता नहीं। यही हाल इसका भी है। कई तरह की किस्से कहानियों के केंद्र में रहे इस विशाल मंदिर का निर्माण एक प्राचीन टीले पर हुआ है। यह भी कहा जाता है कि मंदिर को मजबूती प्रदान करने के लिए चारों ओर जिस तरह का ढ़ांचा बनाया गया उससे मंदिर का आकार किलेनुमा हो गया। उसके चारों तरफ जल निकासी प्रबंधन के लिए जो उपाय किए गए हैं,वे तोपों की तरह नजर आते हैं। चंूकि इस मंदिर का निर्माण अवध के नवाबों ने किया ऐसे में स्वाभाविक तौर पर यह हिंदू-मुसलिए एकता की अनूठी धरोहर भी बन गया। इसी के साथ इस मंदिर से ही साधुओं का प्रभावशाली संगठन भी उभरा। यहां पर साधुओं की संख्या के विस्तार के नाते स्वामी बल्लभाचार्य ने रामानंद संप्रदाय की तीन शाखाओं निर्वाणी,निर्मोही और दिगंबर अखाड़े की स्थापना की और उनका पंचायती स्वरूप खड़ा किया। हनुमानगढ़ी निर्वाणी संप्रदाय का केंद्र है और यहां साधुओं की पूरी फौज होने के नाते औरों पर भी इसका खासा असर है। चंूकि हनुमानगढ़ी की संपन्नता हमेशा से रही है और इसके पास अकूत संपत्ति और खेती बाड़ी की जमीनों के साथ बहुत कुछ है ऐसे में साधुओं के स्वाभाविक आकर्षण का यह केंद्र बना ही है। मुस्लिम नवाबों द्वारा स्थापित इस भव्य मंदिर में आज भी कई अनूठी व्यवस्थाएं विद्यमान हैं। चार भागों में विभक्त तथा मजबूत नियंत्रणवाले इस मंदिर में अभी भी नियमित रूप से करीब एक हजार साधु-संत निवास करते हैं। उनका हाजिरी रजिस्टर भी बाकायदा भरा जाता है। मंदिर के मुखिया को आज भी गद्दीनशीनजी के नाम से जाना जाता है ,जिनके सहयोग के लिए चार महंत हैं। ये महंत अपने-अपने समूहों (पट्टिïयों) के निर्वाचित प्रमुख हैं। हनुमानगढ़ी में चार पट्टियां हैं-उज्जैनिया, बसंतिया ,हरद्वारी तथा सगरिया। इनका नाम एक क्षेत्र विशेष से आए साधुओं के नाम पर पड़ा है। गंगासागर से आए साघुओं की पट्टी का नाम सगरिया है और उज्जैनवालों को उज्जैनिया कहते हैं। गद्दीनशीनजी की ताजपोशी इन पट्टिïयों के बीच से निर्वाचन प्रक्रिया के तहत होती है। ऐसी ही प्रक्रिया चारों पट्टियों के महंत चुनने के लिए भी अपनायी जाती है।

        हनुमानगढ़ी के प्रमुख यानि गद्दीनशीनजी हनुमानजी के प्रतिनिधि हैं और वे मंदिर के ऊपरी हिस्से में विशेष तौर पर बनाए गए आवास में रहते हैं। कुछ विशेष मौकों को छोड़ कर वह कहीं आते जाते नहीं है। वह केवल हनुमानगढ़ी परिसर में ही घूम सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि अदालती मामलों में अदालत स्वंय चल कर उनके पास आती है,वे नहीं जाते हैं। इसी तरह पंजीकरण तथा अन्य मामलों में भी अफसर ही उनके पास आते हैं। गद्दीनशीन अपने निर्वाचन के बाद आजीवन इस पद पर रहते हैं। उनकी मौत या पदत्याग जैसी विशेष परिस्थिति में नया प्रमुख निर्वाचित होता है। महंत दीनबंधुदास के बाद उनका उत्तराधिकार बुजुर्ग महंत मथुरादास को मिला। गद्दीनशीनजी कड़े विधानो से बंधे होने के नाते सरयू स्नान तक के लिए नही जाते हैं। उनके स्नान के लिए हनुमानगढ़ी में ही सरयूजल लाया जाता है। किसी विशेष मौके पर साधुओ की पंचायत की स्वीकृति के बाद ही वे बाहर निकलते हैं। पर तब उनके साथ साधु संतो की विशाल टोली और गाजे बाजे के साथ सवारी चलती है। हनुमानगढ़ी की पट्टियों में सगरिया के महंत ज्ञानदास, उज्जैनिया के महंत संत रामदास, वसंतिया के रामचरणदास और हरिद्वारी के महंत मुरली दास हैं। ये चारों महंत गद्दीनशीनजी के कैबिनेट के सदस्यों की तरह है। इनके साधुओं की तीन जमात लुंडा,खलसा और झुंडी भी शामिल है। हनुमानगढ़ी का मंदिर खुलने के बाद उस पर बारी से तीन-तीन घंटे तक नियंत्रण इन चारों पट्टिïयों का होता है। इस तरह से मंदिर से होनेवाली आय तथा चढ़ावा समान रूप से चारों पट्टिïयों में विभाजित हो जाता है। भले ही किसी पट्टी में साधुओं की संख्या कम हो या ज्यादा हैसियत बराबर की मानी जाती है। यही नहीं हनुमानगढ़ी के सभी साधुओं के लिए न्यूनतम आजीविका की व्यवस्था मंदिर के पुजारी की ओर से की जाती है। पूरे हनुमानगढ़ी का खर्च चढ़ावे से ही जुटता है और कभी कोई कमी नहीं आयी। मंदिर से जुड़े लोग देशी घी के लड्डू से रोज अलग से तृप्त दिखते हैं । साधुओं को अनाज अलग से दिया जाता है। मगर यह तो हनुमानगढ़ी की विशेषताऐं हैं। प्राचीन मंदिर और लाखों की आस्था का केंद्र होने के साथ साधुओं का प्रभावी संगठन होने के नाते यह ईष्र्या का केंद्र भी कम नहीं रहा। इसके वैभव तथा प्रतिष्ठï के नाते अफवाहें भी इसके साथ स्वाभाविक तौर पर जुड़ी हैं। काफी विशाल इस मंदिर से जुड़ी बहुत सी अफवाहें धारणा का रूप ले चुकी हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि मंदिर के नीचे के हिस्से में बहुत सी गुफाएं हैं, जहां पर धनाढ्य श्रद्दालुओं को लूट लिया जाता है। पर वास्तविकता यह है कि मंदिर के नीचे न तहखाना है न ही गुफा। वह जमाना भी अब लद गया है कि मंदिर या सार्वजनिक स्थलों पर कोई लाखों रूपया लेकर पहुंचता हो। पर कई जगह झांकती दिखती लाखौरी ईंटे इस मंदिर की देखरेख में कोताही का प्रमाण भी देती हैं।

        हनुमानगढ़ी के महंतो में महंत लड्डूदास का नाम सभी जानते हैं। बिहार के रहनेवाले महंत लड्डूदास की कहानी भी अजीब है। वे बिहार के एक संपन्न परिवार से आते हैं और उनकी मां अयोध्या दर्शन के लिए परिवार के साथ आयी थी। पर मुख्य मंदिर में प्रणाम करने के लिए उन्होने अपने शिशु को ऐसी जगह रख दिया ,जहां हनुमानजी को चढ़ावा मान लिया जाता है। इस तरह उनका बेटा मंदिर की संपत्ति बन गया। इसी की गोद में जवान हुए महंत लड्डू दास को यह नाम लड्डुओं की निगरानी करते-करते दे दिया गया। वे विहिप से जुड़े हैं और पूर्व संसद विनय कटियार के करीबी लोगों में हैं। वे आज यहां के दबंग लोगों में हैं तथा उन पर कई मुकदमे चल चुके हैं। कुछ साल पहले उन पर हमला भी हुआ था। उनका कहना है कि यहां पर अपराधी हावी होते जा रहे हैं। उनका कई महंतों से संबंध है। तमाम मंहत तो संपत्ति की बिक्री रोकने में शिकार हो गए हैं। वे ज्ञानदास पर भी कई आरोप लगाते हैं।

        सगरिया के प्रमुख ज्ञानदास काफी लंबे चौड़े सुरक्षा घेरे में रहते हैं। उनका कहना है कि इतनी बड़ी जमात में सभी दूध के धुले हैं,यह दावा तो मैं नहीं कर सकता पर मंदिर के बारे में कुछ ज्यादा ही अनर्गल प्रचार हो रहा है। जबकि सच बात यह है कि हनुमानगढ़ी के नाते ही अयोध्या में आनेवाले श्रद्दालु सुरक्षित हैं। उन पर पंडों की ज्यादती हमारे नाते ही नहीं हो पाती न ही किसी के साथ कोई जोर जबरदस्ती होती है। इसी तरह हनुमानगढ़ी के संत बिरला हो या कंगला सबको एक ही बराबरी में रखते हैं। पर यहां के वैभव और साधुओं के संगठन से खिन्न होकर कई निहित स्वार्थी लोग (जिनमें कुछ साधु भी शामिल हैं) तरह-तरह की अफवाहें फैलाते हैं। अगर यहां कोई गुफा होती या यह व्यभिचार का अड्डï होता तो आखिर क्या आज तक उसका खुलासा नहीं हो जाता। महंत लड्डूदास ज्ञानदास के विरोधी हैं,पर वे भी अफवाहों को गलत बताते हैं। उनका कहना है कि यहां की महिमा विचित्र है,जिस नाते तमाम विरोधी बौखलाहट में गलत प्रचार करते हैं। हनुमानगढ़ी में न कोई गुफा है न ही यहां तहखाने है जहां पहुंच कर लड़कियां गायब हो जाती हैं,या गुफा में जाकर कई लोगों का कत्ल हो जाता है.इन बातों से हनुमानगढी की साख को प्रभावित करने की कोशिश होती है, पर सांच को आंच कहां।

  बहरहाल यह बात तो अलग है। हनुमानगढ़ी के इस विशाल मंदिर परिसर का खर्च काफी होता है। मंदिर कोष से हनुमानजी का श्रृंगार,नहलाने धुलाने पर भी काफी राशि खर्च होती है। अन्य खर्चो में गोशाला का संचालन, मंदिर के बाहर बैठनेवाले कंगलों के लिए भोजन तथा प्रसाद की व्यवस्था तथा बंदरों को आहार भी इसी खाते से जाता है। हनुमानगढ़ी इलाके में बंदरों का तो अपार जमघट देखने को मिलता है,पर वे और जगहों की तुलना में अधिक शालीन है और लोगों को धमकाते या काटते नहीं है.उनका मुख्य निशाना प्रसाद होता है। मंदिर के मुख्यद्वार पर देशी घी की खुशबू बिखेर रहे लड्डू और फूल माला की सैकड़ो दूकाने हैं.कई दूकाने खिलौनों,पूजा अर्चना के सामानों तथा किताबों और कैसेटों की भी हैं। हनुमानगढ़ी से जुड़ी हर पट्टी अपना सालाना आमदनी का खर्च और व्यौरा साधुओं की सालाना पंचायत में रखती है। एकादशी को साधुओं के लिये फलाहार का विशेष प्रबंध किया जाता है। हनुमानगढ़ी के पास अपना एक संस्कृत महाविद्यालय भी है। मंदिर की व्यवस्था के तहत बने नियमों के दौरान ही कोई दर्शन कर सकता है,बंद होने के बाद यह किसी के लिए नहीं खुल सकता। संध्या आरती बहुत उल्लास के साथ होती है। सबेरे 5 बजे से मंदिर का दर्शन शुरू होता है। पुजारी 3 बजे ही मंदिर में पहुंच जाते हैं। जबकि भोग 12 बजे लगाया जाता है। मंदिर रोज 12से 1 बजे तक दिन में खुलता है। इसके बाद हनुमानजी का शयन,शयन के बाद मंदिर फिर से चार बजे खुल जाता है। मेलों के दौरान हनुमानजी मात्र एक घंटा ही शयन करते हैं। हनुमान जयंती के मौके पर भारी भीड़ उमड़ती है.पर तमाम उतार-चढ़ाव और अयोध्या में बवाल के बावजूद हनुमानगढ़ी औरों की तरह प्रभावित नहीं हो सकी है। 11 अगस्त 1992 को यहां एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घट गयी थी, जिसके नाते हनुमानगढ़ी की सीढियों से भगदड़ मचने के कारण आठ लोगों की मौत और 60 लोग घायल हो गए थे। इसके बाद यहां की व्यवस्थाओं को और चाक चौबंद किया गया।

हिंदू-मुसलिम एकता का प्रतीक

अवध में संकट मोचन हनुमानजी के उपासकों मे सभी शामिल है। अवध के नवाबो के शासनकाल में ही बड़ा मंगल मनाने की परंपरा शुरू हुई जो हिंदू-मुस्लिम एकता की अनूठी मिसाल साबित हुई। नवाबी काल में ही अवध में बंदरों के शिकार पर भी पाबंदी लगी थी। अवध की राजमाता छतर कुंवर स्वयं बड़ी हनुमानभक्त थीं। उनके बेटे नवाब सआदत अली खां का जन्म मंगलवार के रोज हुआ तो उनका नाम मिर्जा मंगली रखा गया था। सआदत अली एक बार सख्त बीमार पड़े तो उनकी मां ने हनुमानजी का ध्यान किया, जिससे वे ठीक हो गए। इसके बाद मां की इच्छा पर उन्होने अलीगंज का हनुमान मंदिर बनवाया। इसके बाद जेठ के पहले मंगल के रोज नवाब वाजिद अली शाह ने भंडारे की परंपरा शुरू की। जहां तक हनुमानगढ़ी का सवाल है,उनके शासनकाल में यहां कुछ कट्टïरपंथी मुसलमानों ने बवाल करने का प्रयास किया, पर नवाब ने हिंदुओं का साथ दिया और उत्पाती लोगों को सजा दी। हनुमानगढ़ी के मौजूदा मंदिर के निर्माण के 116 साल  बाद कुछ कट्टïपंथी मुसलिम नेताओं ने यह अफवाह फैला कर तनाव कर दिया कि जहां मंदिर बना है, उसी जगह औरंगजेब ने एक मस्जिद बनवायी थी ,जिसे राजा दर्शन सिंह और नाजिम सुल्तानपुर के समय में नष्ट कर दिया गया। घोषणा की गयी कि  मुसलमान वहां 28 जुलाई 1855 को नमाज पढ़ेगे। इस घटना से काफी तनाव बढ़ा पर नवाब वाजिद अली शाह ने इससे जुड़े तथ्यों की बाकायदा जांच करायी और पाया गया कि केवल तिल का ताड़ बनाने का प्रयास किया गया। समिति के समक्ष गवाहों के तौर पर हनुमानगढ़ी के महंतो ने राजमिस्त्री जुम्मन खां और उसके पिता ,जो हनुमानगढ़ी की मरम्मत करते थे और कोतवाल मिर्जा मुनीम बेग का जिक्र भी किया जो कई बार हनुमान गढ़ी का दौरा कर चुके थे। भीतर कोई मस्जिद होती तो उन्होने जरूर देखा होता। शहर कोतवाल मुनीम बेग ने खुद कहा कि उन्होने कई बार महंतो के साथ हनुमानगढ़ी देखी है पर मुझे कोई मस्जिद कभी नहीं दिखी। लाला सीताराम कृत अयोध्या के इतिहास में इस घटना का विस्तार से उल्लेख मिलता है। वास्तव में यह आग गुलाम हुसैन नामक एक सुन्नी फकीर ने लगायी थी जो हनुमानगढी़ के महंतो के बीच ही अधिकतर समय बिताता था। किसी दिन आपस में हुए झगड़े के बाद उसने काल्पनिक मस्जिद का सवाल खड़ा कर बवाल करने का प्रयास किया। बवाल काफी गहरा भी गया और शाही फौज तथा बीच बचाव के बावजूद हुए संघर्ष में 11 हिंदू और 75 मुसलमान मारे गए। मुसलमानों को नायब कोतवाल नासिर हुसैन ने एक बड़ी कब्र मे दफना दिया जिसे गज-ए-शहीदा कहते हैं। अवध के नवाबों की खूबी यह थी कि उन्होने अपने इलाके में नागरिकों को पूरी धार्मिक स्वतंत्रता दी और तीर्थो का विकास भी इस दौरान तेजी से हुआ। नवाब सफदरजंग के समय में अयोध्या को काफी महत्व दिया गया। इसके बाद उनका पुत्र नवाब शुजाउद्दौला ने फैजाबाद का विकास किया। आसफुद्दौला के मंत्री टिकैत राय बहुत धार्मिक प्रवृत्ति के थे और अपनी प्रतिभा से उन्होंने राजा की पदवी तक हासिल की। टिकैतराय ने कई मंदिर और मस्जिद तथा इमामबाड़ा भी बनवाया। यही नहीं नवाबी जमाने में कई मुसलमान अफसरों ने हिंदू पुजारियों को पूजा विधिवत संपन्न कराने के लिए काफी दान-दक्षिणा दी थी, जिसके रिकार्ड पंडो की बहियों में मिलते हैं। हनुमानगढ़ी के भक्त वैरागी अभयराम को शुजाउद्दौला ने सनद प्रदान की थी। नवाब सफदरजंग,शुजाउद्दौला और सुबेदार मंसूर अली खां ने अपने अधिकारियों को यह आदेश भी दिया था कि वे महंतो के लिए हनुमानगढ़ी में कुछ इमारतों को बनाने में मदद कराएं।

        आज भी हनुमानगढ़ी के संतों में पुरानी परंपराएं जीवित हैं। कुछ साल पहले यहीं के महंत ज्ञानदास के आवास पर रोजा इफ्तार कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मुसलमान पहुंचे थे और इसकी खबर भी सुर्खियों में आयी थी। अयोध्या के इतिहास में पहली बार ऐसा आयोजन किया गया था। इसी के बाद अयोध्या के प्रमुख मुसलिम नेता सादिक अली के घर पर ईद मिलन समारोह में बड़ी संख्या में साधु और महंत शामिल हुए.यही नहीं यहां पर संतो ने पूजा अर्चना के बाद हनुमान चालीसा का पाठ भी किया ।

साधुओं में असाधु

हनुमानगढ़ी के साथ जहां एक ओर कई गौरवशाली परंपराएं जुड़़ी रही है, वहीं दूसरी ओर यहां से जुड़े कई साधुओं पर कई तरह के छीटे भी पड़ेहैं। वास्तव में यहां से रामानंद संप्रदाय के साधुओं का ताकतवर संगठन उभरने के बाद जब हिंदू धर्म की रक्षा के नाम पर तमाम पहलवान टाइप साधुओं के लिए दरवाजे खुले तो इसका फायदा उठाते हुए कुछ अराजक तत्व भी इसमें घुस गए।  इनके चलते ही अराजक गतिविधियां भी बढ़ी और कई तो एक दूसरे के खून के प्यासे ही हो गए। राम जन्मभूमि आंदोलन में भी साधुओं में आपसी तकरार बहुत बढ़ गयी है.कई बार साधुओं पर हमले भी हुए हैं। यहां से कई साधु बाहर भी निकाले गए ,पर वे बाहर रह कर दुश्मनी निकालने का काम कर रहे हैं। कई बार गोली भी चल चुकी है.कई महंतो के पास रायफलें और अन्य हथियार हैं। यहां के कई साधु कमंडल के साथ रायफलें भी लेकर चलते हैं। खुद गद्दीनशीन इस बात से नाखुश हैं और कहते हैं-जो साधु अपने साथ बंदूक या रायफल ले कर चल रहा है वह समाज को क्या शिक्षा देगा। जब वे खुद हथियार लेकर चल रहे हैं तो बाकियों को किस मुंह से कह सकते हैं कि भगवान तुम्हारी रक्षा करेगा। यह भी एक अहम तथ्य है कि कई इलाकों से भाग कर अयोध्या पहुंचे अपराधी भी साधुओं की जमात में शामिल हो गए हैं। केवल दाढ़ी और वस्त्र से भेद तो नहीं किया जा सकता है। यहां रह कर आतंक फैलानेवाले कुछ लोग सत्ता के गलियारे तक का सफर करने में सफल रहे। कई साधुओं की हिस्ट्रीशीट तक खुल गयी है। कई साधु दलीय आधार पर बंट गए हैं और सत्ता से जुड़े साधु तो गनर और शैडो लेकर चल रहे हैं। अयोध्या के साधुओं में गनर शैडो कल्चर खूब फल फूल रही है। हनुमानगढ़ी मे कई उतार-चढ़ाव आए हैं,पर उससे इसकी महत्ता पर कोई असर नहीं पड़ा है।




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