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निष्‍काम भाव से मिलता है मोक्ष

 

 

गृहस्‍थ जीवन में संत बड़ी मुश्किल से मिलते हैं। वजह गृहस्‍थ जीवन का मतलब ही जंजाल है। इसे भेद कर प्रभु का स्‍मरण कर लेना ही कोटि-कोटि यज्ञों के पुण्‍य कमाना है। अत: गृहस्‍थ जीवन में सदाचार को आत्‍मसात करने वाले ही इससे उबर पाते हैं। ऐसे सदाचारी गृहस्‍थ जीवन में प्रभु का स्‍मरण करते हुए दायित्‍वों से मुक्‍त होकर बैरागी हो जाएं। वही सच्‍चा संत है। ऐसे संतो के दर्शन बड़े दर्लभ हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह संतों को महिमा मंडित होना अच्‍छा नही लगता। वह एकाकी भाव के होते हैं। मुश्किल से बात करने को तैयार होते हैं। उत्‍तर प्रदेश के आगरा शहर के प्राचीन लंगड़े की चौकी हनुमान मंदिर के महंत पं. डोरीदास उपाध्‍याय भी ऐसे ही संतों में शुमार हैं। प्रचार प्रसार से एकदम दूर। मुक्तिधाम से भी बात करने को तैयार नहीं थे। जब लंगड़े बाबा के दरबार में अर्जी लगाई तो बड़ी मुश्किल से बातचीत करने को तैयार हुए। हम मुक्तिधाम के पाठकों को महंत जी की वाणी जस की तस परोस रहे हैं। हमने इसमें कोई जोड़ घटाव नहीं किया है। (संपादक)

हंत जी गृहस्थ क्या है? गृहस्थ जीवन की कसौटी क्या है? सदाचारी गृहस्थ से आशय क्या है? यह कैसे संभव हैं?

हमारी जिज्ञासा जानकर महंतजी, बड़े गौर से हमें निहारते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वह यह जानने की चेष्ठा कर रहे हैं कि हम क्या चाहते हैं? यह जिज्ञासा हमारे निज मन की है या फिर लोक कल्याण की। जैसे ही उन्हें यह जिज्ञासा लोक कल्याण की नजर आती है प्रारंभ हो जाते हैं गृहस्थ जीवन का सार रामचरित मानस है। भगवान राम की तरह आचरण करते हुए सत्य के मार्ग का अनुगामी होना। सत्य -असत्य, धर्म-अधर्म एवं न्याय-अन्याय में सत्य,धर्म व न्याय का अनुगामी होना ही गृहस्थ हैं। मोक्ष का सबसे सहज और सरल मार्ग गृहस्थ है। जो सत्य का अनुगामी बनकर धर्म, न्याय के मार्ग पर चलता है, वही निष्कामी है। और निष्कामी भाव का अर्थ ही मोक्ष है। परिवार व समाज की जिम्मेदारियों को निभाते हुए धर्म का अनुगामी होना इसकी कसौटी है। गृहस्थ जीवन में माया का भोग भी हैं, क्रोध भी है, लोभ भी है, मोह भी है और अहंकार भी हैं। इन सबका उपभोग करने के बाद भी इनसे दूरी बनाना ही सदाचार हैं। यह केवल संतों के दर्शन एवं गुरूओं की कृपा से संभव है। स्वयं प्रभु श्रीराम ने ,हमारे ऋषि मुनियों ने गृहस्थ को प्रधानता दी है। उसे अपनाया है। जब तक भूख रहेगी स्वार्थ रहेगा। स्वार्थ मोक्ष के मार्ग पर जाने में अवरोध पैदा करेगा। इससे अच्छा है कि भूख को मिटाओ पहले भूख को तृप्त करो। तृप्त मन ही बैरागी होता है। बैरागी बन गये और मन मोह माया में फंसा है। क्या फायदा ऐसे बैराग से? मोह और माया का जहाँ प्रभाव होता है वहाँ काम, क्रोध, लोभ, अहंकार स्वत अपना आशियाना बना लेते हैं। अत: गृहस्थ में रहकर प्रभु का स्मरण ही मोक्ष का सहज मार्ग है।

 कैसे संभव हुआ यह? गृहस्थ जीवन में समाज में आना-जाना भी पड़ता है। रिश्तों को भी वरीयता देनी पड़ती हैं। और फिर मन, जिसे ठहरने की आदत ही नहीं है। चलायमान माना जाता है। कैसे लगाया मन को?

इस प्रश्र पर महंत जी गंभीर हो जाते हैं। लगता है, चिंतन में है कभी लगता है स्मृतियों में खो गए। अचानक मोहनी मुस्कान उभरती है। चेहरे का जर्रा-जर्रा बयां करने लगता है। प्रश्र मन को भा गया है। फिर लम्बी साँस खींचते हुए कहते हैं। लाला रे-यह सब हनुमान जी महाराज की कृपा का फल है। बड़े दयालु है, बाबा। पिताजी के गोलोकवासी होने के बाद बाबा ने अपनी सेवा में ले लिया। फिर बाबा को छोड़कर कहीं जाने का मन ही नहीं हुआ। जब भी मन खिन्न हुआ, जरूरत हुई, बाबा को बता दिया। स्वत: निदान हो गया। पूरे जीवन का महज दस प्रतिशत समय ही सामाजिक व्यवहार को मिला होगा। शेष जीवन लंगड़े वाले बाबा के दरबार में ही गुजार दिया। ज्यादा कुरेदने पर महंत जी कहते हैं। क्या फायदा इतिहास में झांकने का? वर्तमान को देखो, उसे सुधारने का प्रयास करो, इससे भविष्य सुधरेगा। भविष्य सुधारने का सबसे उत्तम कार्य निष्काम भाव से भगवान की वंदना है। जहाँ जिस हाल में हो, खुश रहो, खुशी भगवान के स्मरण से आती है। प्रभु के स्मरण में कोई वंदिश नहीं है। जहां जिस स्थिति में हो उसे स्मरण करते रहो किनारा मिल जायेगा। चल नहीं सकते तो कोई बात नहीं, बोल नहीं सकते, कोई गिला नहीं, देख नहीं सकते कोई शिकायत नहीं, सुन नहीं सकते फिर भी चलेगा। नहाये नहीं, मुंह नहीं धोया उठ नहीं सकते, लाचार हो, कोई जरूरत नहीं किसी देवालय जाने की ,आश्रम जाने की, मन को उसी अवस्था में राम की सेवा में लगा दो, जुबान पर उसका नाम रट लो, खाते,  पीते उठते, बैठते,जागते, सोते,चलते,फिरते, सफर के दौरान, बस में हो, रेल में हो, हवाई जहाज में हो, दुपहिये में हो या पैदल हो, राम के नाम से, कृष्ण के नाम से रहीम के नाम से, कबीर के नाम से या , रैदास के नाम से, गुरू नानक के नाम से नाता जोड़ लो सबका अर्थ एक ही है। उनके नाम का स्मरण करते रहो, सब संकट दूर भाग जायेंगे। पर स्मरण निष्काम भाव से करो। राम के नाम में ये जो र के बाद आने वाला बड़े अ का डंडा है। यह डंडा ही दरअसल अडग़ा है। इस अडग़ें को हटा दो, तो राम के नाम का शाब्दिक अर्थ हो जायेगा – रम। अर्थाथ  प्रभु के सुमरिन में रम जाओ। यही रास्ता है जो गृहस्थ से पार लगाता है। सतमार्ग की ओर मन को धकेल कर ले जाता हे। सतमार्ग ही मोक्ष का मार्ग है। इस भौतिकवादी युग में यदि सुख शांति चाहते हो तो सबसे सरल और सहज भगवान का स्मरण है। स्मरण में पूजा की सामग्री भी नहीं लगती अर्थात् खर्च का कोई नम्बर ही नहीं। स्मरण किसी परचून की दुकान या डिपार्टमेंटल का सामान नहीं है, जो जब इच्छा हुई पैसे से खरीद लिया। स्मरण में निर्धनता और धनवान कोई पैमाना नहीं सभी एक ही सांचे में हैं। फिर भी न मानो तो दुर्भाग्य है। बड़े भाग्य से यह मानव शरीर मिला है। गोस्‍वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा भी है।

बड़े भाग मानस तन पावा।

अत: इसे व्यर्थ मत गंवाओ। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं निष्काम भाव से जो मुझे स्मरण करता है वह मुझमें ही समाहित है। अत: निष्काम भाव होकर आप, जप, तप, पूजा, दान, पुण्य, दर्शन करोगे तो वह किसी खाते में संचित नहीं होगा। वह तो सीधे मुझे प्राप्त हो रहा है। और जो मुझे मिल रहा है उसका अर्थ मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होना है। लेकिन जो स्मरण, जप, तप, यज्ञ, पूजा, पाठ, दान पुण्य और दर्शन कुछ न कुछ प्राप्त करेन के भाव से किया जाता है। उसका बकायदा सिंचित खाता है। यह सभी इस खाते में सिंचित होता जाता है। जो संचय करेगा उसको उसका फल भोगना होगा। फर्ज करो आपने अपनी बिटिया के नाम से कुछ धनराशि बैंक में सात वर्ष के लिये संचित कर दी। डिपोजिट कर दी तो उसका आपको ब्याज मिलेगा कि नहीं। मिलेगा। ठीक यही हाल सिंचित खाते का है। इच्छाओं के लिये प्रभु का स्मरण करने वालों की इच्छाएं अवश्य पूर्ण होती हैं। पर इसके लिये उन्हें फिर जन्म-मरण के चक्रव्यूह में फंसना पड़ता है। फल भोगने के लिये जीवन का जन्म आवश्यक है। अत: यह स्वयं तय करो कि तुम संचय चाहते हो या मोक्ष। मानव कल्याण का सबसे उचित मार्ग निष्काम कर्मयोग है। अत: कर्ता  नहीं अकर्ता बनो। निष्काम भाव गुरू कृपा से ही संभव है। घर छोड़कर भाग जाने से कुछ नहीं मिलता। उसमें भी निष्काम भाव आवश्यक है। गुरू कृपा से जब निष्काम भाव जागता है। तो अपने अंतकरण में झांकने का अवसर मिलता है अंतकरण में जिस स्वरूप के दर्शन होते हैं। वही सच्चिदानंद है। इन्हें पहचान जाओंगे तो मोक्ष मिल जायेगा।

महंतजी आपके अनुसार संसारिक भोगों से कोई फर्क नहीं पड़ता यदि निष्काम भाव जाग्रत हो जाये और यह गुरू कृपा से संभव है, लेकिन आज गुरू भी तो संसारी है। निष्काम भाव जगाने वाले गुरु खुद माया के उपासक हैं ऐसे में निष्काम भाव जाग्रत कैसे होगा?

लाला रे- संसार ही प्रपंच है। अब गुरू भी तो निरे गेरूए हैं। मन बस में है नहीं तो जोगी बनने से क्या लाभ? इससे भोगी ज्यादा ठीक है। सबको पता तो है कि भोगी है। अब तुम न तो योगी बन सके और न भोगी तो यह जो अतृप्ति का भाव है यही भटकाव है। इससे अच्छा तो गृहस्थ की साधना है। यही हाल वर्तमान योगियों व आश्रमों का है। आश्रम तो माया में फंसे लोगों के समूह हैं। ज्ञानी और संत का स्वरूप तो त्यागी होता है। जो खुद ही भोगों में फंसा हो उससे क्या मिलेगा? कंचन, कीर्ति और कामिनी इन तीनों का त्याग करने वाला ही असली संत है। इनमें से एक के भी जाल में फंसने का अर्थ मार्ग से भटकना है। इनसे तो संत ही बच सकता है। क्योंकि संत का अर्थ ही कंचन, कीर्ति और कामिनी का त्याग है।

साधु संत अब धूतऊ लूटे, वांच लेऊ परवाना।  प्यारे रण में चौकस जाना।।

यह मानव शरीर रणभूमि है। इसमें सब लुट जाते हैं। साधु संत भी नहीं बच पाते। कंचन, कीर्ति और कामनी हैं ही ऐसी मायावी हैं कि यह सब को अच्छी लगती है। अपवाद त्यागी पुरूष है, जिन्हें दूसरों की स्त्रियां और धन मिट्टी के समान लगता है। यही संत के लक्षण है।

जननी सम मानहिं परनारी, धन पराव विषते अधिकारी।

मुक्ति का मार्ग साधना है। बड़े पुण्र्यों व गुरू कृपा से यह मिलता है।

शैले-शैले न माणिक्यम्,मैाेिक्तकम- न गजे-गजे।  साधुनाम न सर्वत्र, चंदनं  न वने-वने।।

हर वह वस्तु जो अच्छी दिखती है, आवश्यक नहीं कि वह दिखने जैसी ही अच्छी हो, क्योंकि हर पर्वत माणिक नहीं होता, हर हाथी के मुक्ता नहीं होती वैसे ही सब जगह साधु संत नहीं होते। अत: रूको देखो, और आगे बढ़ो। प्रभु में लीन रहो यही हनुमान जंयती का संदेश है। तेरहवीं के बाद सब भूल जाते हैं। जन्म मरण का चक्रव्यूह ही ऐसा है। कर्मों का फल भोगने के लिये शरीर मिलता है। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के बाद कर्मों के अनुरूप मानव शरीर मिलता है। अत: उसे व्यर्थ में मत गंवाओ। चौरासी लाख योनियों के कष्टों को भोंगने पर जब यह जीव त्राहिमाम करने लगता है, और मोक्ष की कामना करता है। तब मोक्ष मार्ग पर जाने के लिये शरीर मिलता है। अत: इसे हरि भजन में लगाओ। मानव शरीर में आत्मा तो तटस्थ है। जैसे शयन के समय तीन अवस्था रहती है। जागृत, सुसप्ति एवं सुसावस्था। जागृत अवस्था में नेत्र, कान, आदि सब बंद होते हैं मन ब्रह्माण्ड में विचरण करता है। लगता है कि जाग रहे हैं। जब हमारी आंखे, बंद है, कान बदं है, जुबान बंद है, तब हमें यह कौन बताता है कि हम जागृत अवस्था में है? इसका हमें अहसास कराने वाली आत्मा है। हम सुसावस्था में है। गहरी नींद। हम कहते हैं रात दो बजे नींद लगी और फिर होश ही नहीं रहा। प्रश्र यह उठता है कि हमें यह कौन बता रहा है कि हम गहरी नींद में थे? या ऐसे सोये कि होश नहीं रहा। यह बेहोश होने की हमें कौन जानकारी दे रहा है? जब हम अपने से स्वयं यह सवाल करते हैं, तब पता चलता है कि यह सजग प्रहरी जो हर समय नजर रखता है यह तटस्थ अम्पायर आत्मा है। जैसे प्रकाश से लबरेज बिजली के खंभे से लोग निकलते रहते हैं, मगर खंभा तटस्थ रहता है। उसी तरह यह तटस्थ आत्मा है, जो निर्विकार रुप में सब देखती रहती है। आप स्वपनावस्था में  है। मन अचानक स्वप्र लोक में विचरण करने निकल पड़ता है। कभी-कभी बड़ा सुन्दर दृश्य दिखाता है। मन बड़ा गदगद रहता है। हंसाता गुदगुदाता है। तो चेहरे पर हंसी आ जाती है। कभी कभी मन विकार का शिकार हो जाता है। हम सुबह उठकर स्वप्र का ऐसे बखान करने लगते हैं जैसे हम उस दृश्य के साक्षी हैं। जबकि सत्यता यह नहीं है। यह जो आंखों देखा हाल सुनाने वाला कमन्टेटर जो है वह यही आत्मा है जो हमें स्वप्र की जानकारी देती है। तीन गुण हैं। रजोगुण, तमोगुण और सतोगुण। इन तीनों की दृष्टा भी आत्मा ही। रजोगुण की अवस्था का अर्थ सांसारिक भोग, तमोगुण का मतलब आलस्य, नींद, क्रोध और सतोगुण अर्थात् मोक्ष। इन तीनों गुणों का अपना फल हैं। रजोगुण में देह त्यागने वाला जन्म-मरण के चक्रव्यूह में बना रहता है अर्थात् उसे फिर जन्म लेना पड़ता है। ऐसे ही तमोगुण में प्राण निकलने पर पशु-पक्षियों की योनि में जन्म मिलता है और सतोगुण में देह त्याग का अर्थ जन्‍म मरण के बंधन से मुक्‍त होना है। यह सिलसिला न जाने कब से चला आ रहा है और कब तक चलेगा। यह दुनिया कब तक चलेगी कब से है खोज जारी है पर सच कोई नहीं जानता जीव और आत्‍मा का भेद समझना ही अंतरमन में विराजमान सच्चिदानंद को पहचानना है। कहते हैं कि भगवान को ढूंढ रहे हैं।

हम ही भूले, हमी में भूले, हमें ढूंढने हम ही चले

तो हमी ने ढूंढा और हमी को पाया

जैसे सूर्य का प्रकाश पूरे ब्रहमांड में व्‍याप्‍त है।आत्‍मा का भी यही हाल है वह भी पूरे ब्रहमांड में है। जैसे सूर्य का प्रकाश स्‍थूलपर पड़ता है तोवह धूप कहलाने लगता है। यही हाल जीव का है जीव आत्‍मा से खुद को भिन्‍न समझ बैठा है।




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