चारों युग परताप तुम्हारा

मथुरास्‍थ संस्‍कृत विदयुत परिषद के आजीवन सदस्‍य भागवताचार्य डॉ. श्रीनाथ शास्‍त्री मथुरा के उन विद्वानों में शुमार है जिनकी धर्म के क्षेत्र में गहरी पैठ है। मुक्तिधाम के पाठकों को वह बता रहे हैं अजर अमर हनुमान जी की गाथा

आन्जनेय नन्दन श्री बजरंग बली के विषय में गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा में जो, चारो जुग परताप तुम्हारा का उल्लेख किया है। आइए – इसी विषय पर विचार करते हैं कि श्री मारूत नन्दन सतयुग त्रेता द्वापर और कलयुग में कब-कब कहाँ-कहाँ, किस-किस, स्वरूप में किन-किन चरित्रों से युक्त थे। सर्वप्रथम, सतयुग की चर्चा करते हैं। इस युग में पवन पुत्र भगवान श्री शंकर के स्वरूप से विश्व में अवस्थित थे, तभी तो इन्हें (रूद्रावतार) शिव स्वरूप लिखा और कहा गया है। गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा में ही शंकर सुवन केसरी नन्दन कह कर सम्बोधित किया है। इतना ही नहीं वह जब-जब भगवान श्री शंकर शैल तनया को रामकथा सुनाते हैं। और उस राम चरित्र में जहाँ कहीं भी श्री हनुमान जी का चरित्र आता है, भोलेनाथ स्वयं भी सावधान होकर और मन को समाहित करके श्री हनुमान जी का चरित्र कहते हैं, उस की एक झलक देखिये। सावधान पुनि मन कर शंकर। लागे कहन कथा अति सुन्दर॥ इस चोपाई का यह प्रसंग लंका दहन का है। लंका दहन के बाद श्री हनुमान जी महाराज प्रभु श्री राघवेन्द्र सरकार के चरणों में वन्दन करते हैं, और प्रभु उन को हृदय से लगाते हैं, तब भोले नाथ कितने प्रसन्न हो जाते हैं, उसकी झलक उक्त चोपाई में दिखाई पड़ती हैं। और भी-देखिए ऋष्यमूक पर्वत के मैदानी भाग में जब पहली बार राम और लक्ष्मण के साथ में श्री हनुमान जी का मिलन होता है, तब प्रभु के द्वारा अपना परिचय देने पर श्री केसरी नन्दन उनके पावन पगों में जब गिरते हैं, तो फिर भोलेनाथ गिरिजा जी से कह तो उठते हैं। प्रभु पहिचान गहेउ पहि चरना। सेा सुख उमा जाहिं नहिं वरना॥  इस प्रकार के अपने स्वरूप का वर्णन भोले नाथ पार्वती से करते हैं। अत: यह प्रमाणित है कि श्री हनुमान जी सतयुग में शिवरूप में रहते हैं।

त्रेतायुग : त्रेतायुग में तो पवन पुत्र श्री राम जी की छाया हैं। इनके बिना सम्पूर्ण चरित्र पूर्ण होता ही नहीं श्री राम जी भरत जी, सीता जी, सुग्रीव, विभिषण आदि और सम्पूर्ण कपि मण्डल आदि कोई भी उनके ऋण से मुक्त अर्थात उऋण नहीं हो सकता इस प्रकार त्रेतायुग में तो हनुमान जी साक्षात विराजमान है।

द्वापरयुग : द्वापर युग में श्री बजरंगबली अर्जुन के रथ पर विराजित हैं, इसका बड़ा ही सुन्दर प्रसंग है। महाभारत के अनुसार द्रोपदी के समीप में रहने कारण पांचों पाण्डवों को योगश्वर श्री कृष्ण ने एक-एक वर्ष का समय निर्धारित किया था, साथ में ये शर्त भी रखी थी कि यदि एक भाई के समय दूसरा कोई जाता है तो उसे चारों 12 बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ेगा, और यह वनवास अर्जुन को ही युधिष्ठिïर के समय द्रोपदी के समीप जाने पर मिला, और उस समय में अर्जुन ने तीर्थों में ही पर्यटन अधिक किया। इसी प्रकार एक बार किसी तीर्थ में अकस्मात ही अर्जुन का हनुमान जी से मिलन हो जाता है। और भक्त जब भक्त से मिलता है तो निश्चय ही भागवत चर्चा प्रारम्भ हो जाती है। तभी हनुमान जी से अर्जुन ने पूछा अरे राम और रावण के युद्घ के समय तो आप थे। हनुमान जी बोले में केवल उपस्थित ही नहीं था बल्कि युद्घ भी कर रहा था। तभी अर्जुन ने कहा आपके स्वामी मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम तो बड़े ही श्रेष्ठ धनुर्धारी थे फिर उन्हें समुद्र पार जाने के लिए पत्थरों का सेतु बनवाने की क्या आवश्यकता थी, यदि में वहाँ उपस्थित होता तो समुद्र पर वाणों का पुल बना देता जिससे आपका पूरा वानर दल पार होता। तभी श्री हनुमान जी ने कहा असम्भव, वाणों का पुल वहाँ पर कोई काम नहीं कर पाता हमारा यदि एक भी वानर चढ़ता तो वाणों का पुल छिन्न-भिन्न हो जाता। अर्जुन ने कहा नहीं, देखो ये सामने सरोवर हैं, में उस पर बाणों के पुल का निर्माण करता हूँ, आप इस पर चढ़ कर पार कर जायेंगे, यदि आपके चलने से पुल टूट जायेगा तो में अग्रि में प्रवेश कर जाँऊगा, और यदि नहीं टूटता है तो आपको अग्रि में प्रवेश करना पड़ेगा। हनुमान जी बोले मुझे स्वीकार है। तब अर्जुन ने अपने प्रचंड वाणों से पुल तैयार कर दिया। जब तक पुल बन कर तैयार नहीं हुआ तब तक तो श्री बजरंग बली अपने लघु रूप में ही रहे पुल के वन जाने पर हनुमान जी महाराज ने अपना रूप भी उसी समय का सा कर लिया। जैसा श्री तुलसीदास जी ने राम चरित मानस में वर्णन किया है।

कनक भुदरा कार शरीरा।  समय भयंकर अति वल वीरा॥ और ऐसी ही झाँकी इस श्‍लोक में दिखाई देती हैं। उल्लंघ्य सिधो: सलिलं सलीलांय: शोक कन्हिं जनकात्म जाया। आदाय ते नैव ददाह लंकाम्। नमामि तं प्रान्जिलि रान्जनेयं॥  हाँ तो राम जी का स्मरण करके हनुमान जी महाराज उस वाणों के पुल पर चढ़ गए। पहला पग रखते ही पुल सारा का सारा डगमगाने लगा, दूसरा पैर रखते ही चरमराया, किन्तु पुल टूटा नहीं तीसरा पैर रखते ही सरोवर के जल में खून ही खून हो गया। तभी श्री हनुमान जी महाराज पुल से नीचे उतर आये। और अर्जुन से कहा कि अग्रि तैयार करो। अग्रि प्रजुलित हुई, वैसे अग्रि में इतनी शक्ति नहीं कि श्री हनुमान जी महाराज को जला सके जैसे ही हनुमान जी महाराज अग्रि में कूदने चले वैसे लीला पुरूषोत्तम श्री कृष्ण प्रकट हुये और बोले ठहरो। तभी अर्जुन और हनुमान ने प्रणाम किया। तभी प्रभु ने कहा क्या वाद विवाद चल रहा है बताओ तब सब प्रसंग सुनने के पश्चात प्रभु ने कहा आपका तीसरा चरण पुल पर पड़ा। तभी कछुआ बनकर पुल के नीचे मैं पहुच गया। कछुए के रूप में मुझ लेटे हुए का भी रक्त निकाल गया। तब हुनमान जी महाराज ने क्षमा मांगी। मैं तो बड़ा अपराधी निकला, मेरा ये अपराध कैसे दूर हो तब दयालु प्रभु ने कहा ये सब मेरी इच्छा से हुआ है। आप मन खिन्न मत करो। और मेरी आज्ञा है, कि तुम अर्जुन के रथ और ध्वजा पर स्थान ग्रहण करो। इसलिये द्वापर में श्री हनुमान जी महाराज अर्जुन के ध्वजा पर स्थिति है। ये द्वापर का प्रसंग रहा अब कलियुग में हनुमान जी कहाँ हैं।

 कलियुग – कलियुग में श्री हनुमान जी महाराज यत्र-यत्र रघुनाथ कीर्तन तत्र कृत मस्तकान्जलि। वाष्प वारि परिपूर्ण लोचनं मारूतिं नमत राक्षसान्तक॥ कलियुग में जहाँ-जहाँ भगवान श्री राम की कथा कीर्तन इत्यादि होते हैं। वहाँ हनुमान जी गुप्त रूप में विराजमान रहते हैं। सीता जी के वचनों के अनुसार – अजर अमर गुन निधि सुत होऊ।। करहु बहुत रघुनायक छोऊ॥ हनुमान जी महाराज कलियुग में गन्धमादन पर्वत पर निवास करते हैं ऐसा श्री मद्भागवत में वर्णन आता है। अत्यन्त बलशाली, परम पराक्रमी, जितेन्द्रिय, ज्ञानियों में आग्रगण्य तथा भगवान् राम के अनन्य-भक्त श्रीहनुमान जी का जीवन भारतीय जनता के लिए सदा से प्ररेणादायक रहा है। वे वीरता को साक्षात् प्रतिमा है एवं शक्ति तथा बल-पराक्रम की जीवन्त मूर्ति। देश-देशान्तर विजयिनी भारतीय मल्ल-विद्या के यही आराध्य है, इष्ट है। आप पहलवानों के किसी भी अखाड़े में जाएं तो वहाँ आपको किसी दीवार के आले में या छोटे -मोटे मन्दिर में हनुमान जी  की प्रतिमा प्रतिष्ठित अवश्य मिलेगी। उनके चरणों का स्पर्श और नाम स्मरण करके ही पहलवान अपना कार्य शुरू करते हैं। जब भारत-भू पर मुस्लिम-साम्राज्य की काली घटाएं छा गई थी, चारों और अल्लाह ओ अकबर का ही गर्जन सुनाई देता था, उस समय प्रात: स्मरणीय श्री गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने हनुमान-चालीसा, हनुमान-बाहुक, संकटमोचनादि रचनाओं द्वारा निष्प्राण हिन्दु-जाति की नसों में प्राण फूंकते हुए स्वयं भी काशीपुरी में संकट-मोचन हनुमान की स्थापना की और अपने भक्तों द्वारा भी स्थान-स्थान पर हनुमत्पूजा का प्रचार कराया। औरंगजेब काल में उन्हीं के आदर्श पर छत्रपति शिवाजी ने दश-दश कोश की दूरी पर हनुमान मन्दिर की स्थापना कर उन्हीं मारूती-नन्दन के नेतृत्व में वहां अखाड़े और दुर्गा की स्थापना की थी। यही अखाड़े आगे चलकर हिन्दु-धर्म संरक्षा के गढ़ बने और इन्हीं की सहायता से भारत से यवन-साम्राज्य का कलंक धोया जा सकता। आज भी आप दक्षिण में जाइये तो ग्राम-ग्राम में आपको ग्राम-रक्षक के रूप में हनुमान जी की मूर्ति स्थापना हुई मिलेगी, जिसे ग्राम-मारूति कहा जाता है। युद्घप्रिय मराठी जाति के हनुमान जी परम आराध्य हैं, आज भी वहां हनुमत्पूजा का बड़ा प्रचार है। वीरता में हनुमान जी का कोई सानी नहीं। ये कारण है कि भारत-सरकार भी सर्वोत्कृष्टï वीरता-पूर्ण कार्य के लिये महावीर चक्र नामक स्वर्ण-पदक ही प्रदान करती है। भारत इतिहास के सर्वोत्कृष्टï योद्घा अर्जुन ने अतुल पराक्रम के नाते इन्हें ही अपने रथ की ध्वजा पर स्थान दिया था।

                हनुमान जी केवल धीर-वीर ही नहीं है। भगवान श्रीराम के चरणों को स्पर्श करता हुआ उनका दिव्य रूप, उनकी उत्कट स्वामि-भक्त, अनन्य-निष्ठï और प्रशंसनीय विनय का जीता-जागता चित्र है। उन जैसी अनन्य-भक्ति संसार में विरले जनों को ही प्राप्त होती है। यदि मनुष्य पूर्ण श्रद्घा और विश्वास से इनका आश्रय ग्रहण कर लें तो फिर तुलसीदास जी की भांति उसे राम-दर्शन होने में देर नहीं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने –

      जो यह पढ़े हनुमान चालीसा।  होई सिद्घि साखी गौरीशा॥

-जैसी प्रबल चौपाई अपने अनुभव के आधार पर ही कही है, केवल तुक मिलाने मात्र के लिए रहीं।

                क्या हनुमान बन्दर थे?

                हनुमान् जी के समबन्ध में यह प्रश्र प्राय: सर्वत्र उठता है कि ‘क्या हनुमान जी बन्दर थे?  कुछ लोग रामायणादि ग्रंथों में लिखे हनुमान जी और उनके सहयोगी तथा सजातीय बान्धव सुग्रीव अंगदादि के नाम के साथ ‘वानर, कपि, शाखामृग, प्लवंगम आदि विशेषण पढ़कर और उनकी पुच्छ, लांगूल, बाल्धी और लाम की करामात से लंका-दहन का प्रत्यक्ष चमत्कार अनुभव करके एवं यत्र-तत्र सर्वत्र सपुच्छ प्रतिमाएं देखकर उनको वर्तमान पशु प्राय: बन्दरों जैसा मानने में ही सनातनधर्म का गौरव मानते हैं। दूसरा पक्ष  जो कि अपने को बुद्जीवी समझता है, वह रामायण के कपित्व-द्योतक अंश को विधर्मी-प्रक्षिप्त बताकर अपनी कल्पना से उन्हें पुच्छरहित अपटूडेट मानव कहने में ही बुद्घि का सदुपयोग अनुभव करता है।

                हम इन तीनों ही बलों से पूछना चाहते हैं कि आखिर हनुमान जी के अस्तित्व में ही तुम्हारे पास क्या प्रमाण है? कहना न होगा कि दोनों का यही उत्तर हो सकता है कि रामायण। जब ‘रामायण के आधार पर ही हनुमान जी का होना सिद्घ मानते हो तब, तुम दोनों ही ‘अर्धकुक्कुटी  न्याय से रामायण की आधी बात को क्यों मानते हो और आधी को क्यों छोड़ते हो? पशुप्राय: मानने वाले दल को श्री वाल्मीकी रामायण के उन प्रमाणों को भी तो समझने का प्रयत्न करना चाहिये जिनसे कि हनुमान जी का व्याकरण-बेत्तृत्व, शुद्घ-भाषण-कला-कुशलत्व, बुद्घिमता-वरिष्ठïता एवं ज्ञानिनामग्रगण्यत्व सिद्घ होता है। जैसे-जब भगवान राम को पहले पहल हनुमान मिले तो उनकी बातचीत से प्रभावित होकर भगवान् ने एकान्त में लक्ष्मण से कहा कि –

                कृत्स्नं व्याकरणं शास्त्रमनेन बहुधा श्रुतम्॥

                बहु व्याहरताऽनेन न किञ्चिदपशब्दितम्।।

अर्थात् – (हे लक्ष्मण!) मालूम पड़ता है कि इस व्यक्ति ने समस्त व्याकरण शास्त्र का खूब स्वाध्याय किया है तभी तो इस लम्बी चौड़ी बातचीत के दौरान में इसने एक भी अशब्द नहीं बोला। क्या रामायण के इस सुस्पष्टï वर्णन की विद्यमानता में रामायण में आस्था रखने वाला कोई हनुमत-भक्त उन्हें कीकी कीकी करके मकानों की ईंट फाडऩे वाले और कपड़ा लत्ता उठा भागने वाले पशुप्राय: लालमुँहे बन्दरों का किवा कलमुँहे लंगूरों का सजातीय मानने को उद्यत हो सकता है? फिर आप रामायण के लेख के सर्वथा विपरीत उन्हें पशु मानने का ही दुराग्रह क्यों करते हैं? इसी प्रकार कथित बुद्घिवादी-दल से भी प्रष्टïब्य है कि यदि तुम लोग रामायण को कोरा कल्पित उपन्यास ही मानते हो तो फिर हनुमान को रामायण के लेख के विरूद्घ बना डालने में अपना बुद्धि -वैभव क्यों खर्च करते हो? कल्पित उपन्यास को बुद्घिग्राह्यï बनाने से क्या लाभ होगा? उसे लकीर के फकीर आस्तिकों के लिये ज्यों का त्यों रहने दीजिये। और यदि हनुमान जी के अस्तित्व को एक ऐतिहासिक-तथ्य स्वीकार करते हो तो फिर उनके होने में जो रामायण प्रमाण है, वही रामायण उनके स्वरूप और चरित्र के चित्रण में भी एक मात्र साक्षी है, ऐसी दशा में मिथ्या-कल्पना क्यों करते हो? वाल्मीक जी ने जहाँ उन्हें विशिष्टï पण्डित, राजनीति में धुरन्धर और वीर-शिरोमणि प्रकट किया है, वहाँ उनको लोमश ओर पुच्छधारी भी शतश: प्रमाणों में व्यक्त किया है। इसलिये ईमानदारी का तकाजा है कि उक्त दोनों वर्णनों का समन्वय करके हनुमान जी का स्वरूप स्थिर कीजिये यही न्यास्य होगा!

नौ लाख वर्ष पूर्व विलक्षण जाति

हनुमान विषयक रामायण के समस्त वर्णन को मनन करने पर यह सिद्धांत स्थिर होता है कि आज से लगभग  नौ लाख वर्ष पूर्व एक ऐसी विलक्षण वानर जाति भी भारतवर्ष में विद्यमान थी, जो कि आज के हाथ पांव दोनों से चलने वाले बन्दरों की भांति पशुप्राय: नहीं थी किन्तु जहाँ वह  अर्ध-सभ्य,  पढ़ी-

लिखी, राज्यसत्ता-सम्पन्न और एक वीर जाति थी, वहाँ उसके शरीर पर साधारण मनुष्यों की अपेक्षा अधिक रोम होते थे तथा पूंछ भी होती थी। अब वह जाति भारत में तो दुर्भाग्यवश लुप्‍त हो गई परन्तु बाली द्वीप में अब भी पुच्छधारी जंगली मनुष्यों का अस्तित्व विद्यमान है, जिनकी पूँछ प्राय: छ: इंच के लगभग अवशिष्ट रह गई है। यह प्राय: सभी पुरातत्वेत्ता अनुसन्धायक एक मत से स्वीकार करते है कि पुराकालीन बहुत से प्राणियों की नस्ल अब सर्वथा समाप्त हो चुकी है। अमेरिका की प्रसिद्घ रैड इण्डियन नामक जाति उत्तरोत्तर क्षीण होती जा रही है, यदि यही क्रम एक सस्राब्दी पर्यन्त चलता रहा तो वह भी अनेक जातियों की भांति केवल पुस्तकों के वर्णन में अवशिष्ट रह जाएगी। इसलिये वहाँ की सरकार अब उसकी विशेष संरक्षा के लिये प्रयत्नशील होने लगी है। ‘विधर्मियों ने हिन्दु जाति के अपमान के लिये पूँछ वाली बात रामायण में घुसेड़ दी।  यह कल्पना भी सर्वथा निर्मूल है, क्योंकि कश्मीर  से लेकर कन्याकुमारी  तक पुरातन हस्तलिखित और ताड़पत्रों पर खुदी सभी प्रतियों में प्रक्षेप कर सकने की बातकदापि कदापि  विश्वास योग्य नहीं है। फिर यदि किसी को हिंदु जाति के अपमानार्थ ऐसा कुकृत्य करना ही था तब उसे राम जी के एक साधारण सेवक के पूँछ लगाने की बजाय हिन्दु जाति के सर्वस्व भगवान् राम को ही लगानी चाहिये थी। इसलिये यह सब कल्पानाएँ व्यर्थ हैं, श्री हनुमान् जी महाराज जहाँ बुद्घिमान् विद्वान परमज्ञानी और वीर शिरोमणि थे, वहाँ वे पुच्छधारी लोमश वानर भी थे यही रामायणों का समन्वित निहितार्थ है। हनुमान जयन्ती के दिन हनुमान जी के पूजन नाम-संकीर्तन आदि के अतिरिक्त, शारीरिक शक्ति-प्रदर्शन के खेलों का आयोजन होना चाहिये। नगर के बालकों की दौड़, लाठी, तलवार, गदका इत्यादि खेलों का सामूहिक आयोजन हो और भारतीय इतिहास के वीर की जीवन-गाथा जनसाधारण को समझाई जानी चाहिए। राष्ट्रीय अकर्मण्यता और भीरूता को मिटाकर जनता को शक्तिशाली बनाने के लिये देश में हनुमान जयंती जैसे उत्सवों की परम आवश्यकता है। उन जैसा सदाचार, उन जैसा पराक्रम, अनुशासन और ब्रह्मचर्य किसी भी जाति व राष्ट्र के लिये स्थायी गौरव का कारण हो सकता है।




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